कवासी लखमा क्यों छोड़े गए? खनिज, बेटा और सत्ता का त्रिकोण

Madhya Bharat Desk
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कवासी लखमा की रिहाई के बाद बस्तर की राजनीति में जो तस्वीर उभर रही है, वह सिर्फ़ न्याय या जमानत की नहीं बल्कि सियासी साठगांठ की ओर इशारा कर रही है ?

 क्योंकि जिस तरह जेल से बाहर आते ही लखमा ने बीजेपी नेताओं—खासतौर पर डिप्टी सीएम अरुण साव—की खुले मंच से तारीफ की और बदले में बीजेपी नेताओं ने उनके “फंसाए जाने” की बात कहकर सहानुभूति दिखाई, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बस्तर की राजनीति अब टकराव नहीं बल्कि तालमेल के रास्ते पर बढ़ रही है; राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज़ है कि उम्र और भविष्य की रणनीति को देखते हुए लखमा अपने बेटे हरिश लखमा को राजनीति में स्थापित करने की जमीन तैयार कर रहे हैं

और इसके लिए सत्ता पक्ष से टकराने के बजाय समझौते का रास्ता चुना जा सकता है, खासकर तब जब बस्तर में लौह अयस्क, टिन और अन्य खनिज संसाधनों के दोहन को लेकर बड़े प्रोजेक्ट्स तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं—ऐसे में यह आशंका भी जताई जा रही है

कि खनिज संपदा का खेल किसी एक दल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रभावशाली स्थानीय नेताओं और सत्ता के बीच आपसी सहमति से आगे बढ़ेगा, जहां विरोध की जगह चुप्पी और संघर्ष की जगह समन्वय होगा, और यही वजह है कि कवासी लखमा की रिहाई को अब सिर्फ़ कानूनी राहत नहीं बल्कि बस्तर में बनते नए सियासी गठजोड़ और संभावित साठगांठ के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

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