बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के विख्यात कार्डियोथोरेसिक सर्जन पद्मश्री डॉ. तपन कुमार लाहिड़ी (टी.के. लाहिड़ी) की सादगी और मानव सेवा ने उन्हें वाराणसी की जनता का ‘धरती का भगवान’ बना दिया है। 1974 में मात्र 250 रुपये मासिक वेतन पर लेक्चरर बने डॉ. लाहिड़ी ने 35 वर्षों की सेवा के दौरान न केवल सैकड़ों डॉक्टर तैयार किए, बल्कि अपनी तनख्वाह और भविष्य निधि गरीब मरीजों की मदद के लिए समर्पित कर दी।
देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री और बीएचयू के कुलपति भी उनसे मिलने आए, लेकिन डॉ. लाहिड़ी ने साफ कहा, “मैं मरीजों से केवल ओपीडी में ही मिलता हूँ।” उनका यह सिद्धांत है कि हर मरीज समान है—चाहे वह प्रधानमंत्री हो या मजदूर।
सेवानिवृत्ति के बाद भी डॉ. लाहिड़ी ने अमेरिका के प्रतिष्ठित अस्पतालों के प्रस्ताव ठुकराए और अपने गरीब मरीजों की सेवा जारी रखी। वे हर मौसम में पैदल अस्पताल आते हैं, साधारण आवास में रहते हैं और 20–25 रुपये की थाली से भोजन करते हैं।
डॉ. लाहिड़ी की ओपन-हार्ट सर्जरी की कुशलता और अनुशासन ने हजारों गरीब मरीजों की जान बचाई। बीएचयू में कहा जाता है, “जिस मरीज को लाहिड़ी सर देख लेते हैं, उसकी जान बचने की उम्मीद बढ़ जाती है।” उनका जीवन त्याग, तपस्या और सेवा का सजीव उदाहरण है।



