संस्कार, सनातन और संस्कृति की दुहाई देने वाली भाजपा का असली चेहरा 02 फरवरी 2026 को सरगुजा में आयोजित भाजपा कार्यालय के भूमि पूजन में सामने आ गया। जिस परंपरा में भूमि पूजन का अर्थ विनम्रता, समर्पण और धरती से जुड़ाव होता है, उसी परंपरा को सत्ता के अहंकार ने कुचल दिया। भगवान गौरी-गणेश को धरातल पर विराजमान किया गया, जबकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उनके साथ मौजूद मंत्रीगण गद्देदार सोफों पर बैठकर पूजा करते नजर आए।
यह कोई छोटी चूक नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतिबिंब है जहाँ पद और प्रोटोकॉल आस्था से ऊपर रख दिए जाते हैं। जो पार्टी हर चुनाव में राम, मंदिर और सनातन की राजनीति करती है, वही पार्टी पूजा के समय भी सत्ता का आसन छोड़ने को तैयार नहीं दिखी। संदेश साफ था—भगवान नीचे रहेंगे, नेता ऊपर बैठेंगे।
इस दृश्य ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। सवाल उठे कि क्या सनातन सिर्फ भाषणों और पोस्टरों तक सीमित रह गया है? क्या जमीन पर बैठना सिर्फ आम जनता और पुजारी का दायित्व है, जबकि सत्ता में बैठे लोग हर परिस्थिति में विशेषाधिकार के हकदार हैं?
भाजपा की किरकिरी यहीं नहीं थमी। भूमि पूजन से एक दिन पहले वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी के स्वागत का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक ही गुलदस्ते से दर्जनों पदाधिकारी और कार्यकर्ता स्वागत करते दिखाई दिए। बाद में जिलाध्यक्ष की नाराजगी पर अतिरिक्त गुलदस्ते मंगवाए गए, लेकिन तब तक पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठ चुके थे|
यह बहस किसी एक पूजा या एक कार्यक्रम की नहीं है। यह बहस उस सोच की है जहाँ सत्ता अहंकार बन जाती है और सनातन सिर्फ नारा। अब देखना यह है कि भाजपा नेतृत्व इसे महज संयोग बताकर टालता है या आत्ममंथन करता है, क्योंकि जनता अब दृश्य देखकर निर्णय करने लगी है।



