रायपुर। प्रदेश में धान खरीदी की प्रक्रिया 30 जनवरी को समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके बाद किसानों की समस्याओं को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखकर धान खरीदी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं और सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है।
अपने पत्र में भूपेश बघेल ने कहा कि खरीफ विपणन वर्ष 2025–26 के लिए धान खरीदी की तय समय-सीमा पूरी हो चुकी है। शासन की ओर से लक्ष्य प्राप्ति के दावे जरूर किए जा रहे हैं, लेकिन प्रदेश के कई इलाकों से आ रही सूचनाएं जमीनी हकीकत को लेकर चिंता बढ़ा रही हैं। धान खरीदी बंद होने के बाद अनेक किसान, खासकर ऋणग्रस्त किसान, असमंजस और आर्थिक दबाव में हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार से पूछा है कि इस वर्ष धान खरीदी का कुल लक्ष्य कितना तय किया गया था और उसके मुकाबले कितनी मात्रा में धान की खरीदी हुई है। साथ ही लक्ष्य पूर्ति का वास्तविक प्रतिशत क्या है। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि इस सत्र में कुल कितने किसानों ने धान बेचने के लिए पंजीयन कराया था, कितनों के टोकन जारी किए गए और कितने किसानों का धान पूरी तरह खरीदा गया।
भूपेश बघेल ने सवाल उठाया कि कितने किसानों के टोकन तकनीकी कारणों या समय-सीमा समाप्त होने के चलते रद्द कर दिए गए। क्या सरकार के पास ऐसे किसानों का कोई स्पष्ट आंकड़ा है, जो पंजीकरण के बावजूद धान नहीं बेच पाए? उन्होंने यह भी पूछा कि पंजीकृत ऋणी किसानों में से कितनों का धान शत-प्रतिशत खरीदा गया है और जिनका धान नहीं खरीदा जा सका, वे अपने अल्पकालिक कृषि ऋण की अदायगी कैसे करेंगे।
पत्र में यह मुद्दा भी उठाया गया कि अब तक खरीदे गए धान के बदले कितने किसानों को भुगतान मिल चुका है और कितनी राशि अभी लंबित है। इसके साथ ही एग्रीस्टैक पोर्टल में तकनीकी खामियों के कारण जिन किसानों का रकबा शून्य या कम दिखाया गया, या जिनकी जानकारी गलत दर्ज हुई, उन्हें हुई आर्थिक क्षति का आकलन और मुआवजा कैसे दिया जाएगा—इस पर भी उन्होंने सरकार से जवाब मांगा।
पत्र के अंत में भूपेश बघेल ने कहा कि अन्नदाता के सम्मान और उसके परिश्रम की कीमत की रक्षा करना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि प्रशासनिक कमियों के चलते प्रदेश का कोई भी किसान अपनी उपज बेचने से वंचित रह गया है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार इन सभी बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करेगी और किसानों के हित में ऐसे फैसले लेगी, जिससे कोई भी किसान आर्थिक नुकसान या कर्ज के बोझ से परेशान न हो।







