पत्रकारिता विश्वविद्यालय कुलपति चयन: संघ का केंडिडेट अयोग्य तो एक गैर संघी और तीसरा कम्युनिस्ट… 3 को स्क्रीनिंग

Madhya Bharat Desk
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रायपुर। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार वि.वि. रायपुर में कुलपति की नियुक्ति कर पाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।बता दें कि कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में 11 महीने से नए कुलपति की नियुक्ति लंबित है। कुलपति नियुक्ति को लेकर नियम में बदलाव के चलते एक बार विज्ञापन जारी करने के बाद रद्द कर दिया गया था। दूसरी बार विज्ञापन आया तो आवेदन ही इतने कम आये की कुलपति के योग्य व्यक्तियों की लाले पड़ गए। अंत में छटनी कर मात्र 3 लोगों को ही कल इंटरेक्शन के लिए लोक भवन बुलाया गया है। गौरतलब हो कि यह एक मात्र विवि है जो हमेशा से आरएसएस के प्रभाव में रहा है।परंतु इस बार अजीब सा समीकरण बनते नजर आ रहा है। एक दावेदार वीरेन्द्र कुमार भारती जो दिल्ली के संघ से जुड़े व्यक्ति हैं,परंतु विज्ञापन में उल्लेखित आवश्यक अर्हता को वे पूरी नहीं करते।ये मात्र 5 वर्ष ही प्राध्यापक रहे हैं और आज की स्थिति में सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। जबकि विज्ञान में 10 साल प्रोफेसर होना आवश्यक है।दूसरे दावेदार आशुतोष मिश्रा का संघ से कोई नाता नहीं है,वहीं तीसरे व्यक्ति मनोज दयाल कम्युनिस्ट हैं।

प्रो. वीरेंद्र कुमार भारती

कुलपति के विज्ञापन में स्पष्ट उल्लेख है कि आवेदक को कम से कम 10 वर्ष प्रोफेसर होना आवश्यक है, ऐसे में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में इंटरेक्शन के लिए जो तीन लोगों को बुलाया गया है, उसमें वीरेन्द्र कुमार भारती निर्धारित अर्हता नहीं रखते। वीरेन्द्र कुमार भारती आज की स्थिति में सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं, जो अपने शैक्षणिक कैरियर में 10 साल प्रोफेसर नहीं रहे। संघ की पाठशाला में प्रशिक्षण होना ही उनकी मूल योग्यता है और उनको इस चयन प्रक्रिया में सम्मिलित करना ही इस बात का प्रमाण है कि यह सरकार इस व्यक्ति को कुलपति नियुक्त करना तय कर चुकी है। वीरेन्द्र कुमार भारती सेवानिवृत्त व्यक्ति हैं। जिनकी उम्र 65 वर्ष से अधिक है और नियम यह है कि 70 वर्ष की उम्र तक ही कुलपति रहा जा सकता है। ऐसे में अगली बार 5 वर्ष पूर्व ही कुलपति चयन की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।

प्रो. आशुतोष मिश्रा

जानकारों का मानना है कि कुलपति जैसे पदों के लिए आवेदकों की पर्याप्त संख्या में प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। सिर्फ संघ के किसी व्यक्ति को उपकृत करना है इसलिये किसी को भी कुलपति बना दिया जाना गलत है। यह उच्च शिक्षा में गलत परंपरा की शुरुआत होगी। कुलपति के लिए खोजबीन समिति को कुल 3 का नाम पैनल बना कर कुलाधिपति को सौंपना है और इसके इंटरेक्शन के लिए 3 को ही बुलाया जाना कहाँ तक सही है। पर्याप्त संख्या में आवेदक नहीं थे तो न्यायसंगत यही होता कि आवेदन करने कुछ समय और दे दिया जाता। हो सकता है इससे संघ के ऐसे लोग भी जो निर्धारित योग्यता रखते हैं और किसी वजह से जानकारी के अभाव में आवेदन नहीं कर सके थे वे भी आवेदन कर लेते।

प्रो. मनोज दयाल

यह भी गौर करने वाली बात है कि कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को संघ ने कभी यहां का शैक्षणिक स्तर सुधरे को लेकर कोई प्रयास नहीं किया। सिर्फ यह विवि संघ का प्रचार केन्द्र बना कर रहा। ऐसा कर यहां के विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।इससे इस विश्वविद्यालय के शैक्षणिक स्तर में लगातार गिरावट देखी जा रही है। शिक्षाविदों की तो यह मांग है की इस विश्वविद्यालय को पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में मर्ज कर देना चाहिए। बहरहाल देखना होगा कि इस विवि के कुलपति नियुक्ति को लेकर सरकार क्या निर्णय ले पाती है या एक बार आवेदन की तिथि बड़ा कर अन्य को एक मौका और देगी।

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