आदिवासी आक्रोश की आहट: क्या सरकार जनता की आवाज़ सुन रही है?

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ में जल, जंगल और जमीन का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है। बस्तर और सरगुजा संभाग से शुरू हुआ आदिवासी आंदोलन अब मैदानी इलाकों तक पहुंच चुका है। बोधघाट परियोजना सहित विभिन्न स्थानीय मुद्दों को लेकर आदिवासी समुदाय लगातार बैठकें कर रहा है, विरोध प्रदर्शन कर रहा है और अपनी चिंताओं को सरकार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।

22 जून को धमतरी जिले के सिहावा-नगरी क्षेत्र के 45 गांवों के हजारों आदिवासी कलेक्ट्रेट पहुंचे और अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया। यह केवल एक जिले का आंदोलन नहीं, बल्कि उस बढ़ती बेचैनी का संकेत है जिसे लंबे समय से महसूस किया जा रहा है। सवाल यह है कि यदि सरकारी योजनाएं और जनसंपर्क अभियान वास्तव में जमीनी स्तर पर प्रभावी साबित हो रहे हैं, तो फिर बड़ी संख्या में लोगों को सड़कों पर उतरने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जनता की समस्याओं को लेकर सत्ता पक्ष के कई स्थानीय पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी समय-समय पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। जब संगठन के भीतर से ही जनसमस्याओं के समाधान को लेकर आवाज़ उठने लगे, तो इसे केवल विपक्ष की राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह सरकार और प्रशासन दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय है।

आदिवासी समाज केवल मुआवजे या योजनाओं की बात नहीं कर रहा, बल्कि अपनी पहचान, संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों और भविष्य की सुरक्षा को लेकर आशंकित है। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें प्रभावित समुदायों की सहमति, भागीदारी और विश्वास शामिल हो। अन्यथा विरोध और असंतोष का दायरा लगातार बढ़ता जाएगा।

इसी बीच भाजपा नेतृत्व ने 24 जून को प्रदेश पदाधिकारियों और जिला अध्यक्षों की मैराथन बैठक बुलाई है। माना जा रहा है कि संगठन और सरकार के सामने बढ़ते जनअसंतोष, स्थानीय मुद्दों और आगामी राजनीतिक चुनौतियों पर गंभीर चर्चा होगी। यह बैठक केवल संगठनात्मक समीक्षा तक सीमित रहेगी या जनता के सवालों का समाधान खोजने की दिशा में ठोस रणनीति भी बनेगी, इस पर सभी की नजरें हैं।

आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि सरकार आदिवासी समाज की चिंताओं को संवाद और विश्वास के माध्यम से दूर करती है या फिर आंदोलन का यह दायरा और व्यापक होता जाता है। लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को सुनना विकल्प नहीं, बल्कि जिम्मेदारी होती है। जब हजारों लोग सड़क पर उतरकर अपनी बात कह रहे हों, तब सत्ता को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि जवाब भी देना पड़ता है।

— नागेन्द्र पांडेय

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