रायपुर। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंचने के दावों के बीच अब एक अलग तरह की बहस ने जन्म ले लिया है। इसे राजनीतिक तौर पर ‘प्रशासनिक नक्सलवाद’ का नाम दिया जा रहा है। क्या प्रदेश की नौकरशाही इतनी ताकतवर हो गई है कि अब वरिष्ठ नेताओं और सांसदों की शिकायतों को भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा?
लोकतंत्र में जनता अपने सांसदों और विधायकों को इसलिए चुनती है, ताकि वे क्षेत्र की समस्याओं और जनता की आवाज को सरकार और प्रशासन तक पहुंचा सकें। लेकिन जब कोई सांसद यह आरोप लगाए कि अधिकारी फोन नहीं उठाते, पत्रों का जवाब नहीं देते या कथित तौर पर ‘जो करना है कर लो’ जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो मामला केवल एक जनप्रतिनिधि और अधिकारी के बीच विवाद तक सीमित नहीं रहता।
मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि शिकायत विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के दो लोकसभा सांसदों की ओर से सामने आई है। दुर्ग सांसद विजय बघेल और रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने अलग-अलग मामलों में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष तक विशेषाधिकार हनन की शिकायत पहुंचाई है।
दोनों मामलों के केंद्र में एक ही बड़ा सवाल है—क्या प्रदेश की नौकरशाही निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह तरीके से काम कर रही है?
दुर्ग सांसद विजय बघेल की शिकायत दो प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के खिलाफ बताई जा रही है। उनका आरोप है कि जब भी उन्होंने जनहित से जुड़े मामलों में जानकारी मांगी, अधिकारियों की ओर से अपेक्षित जवाब नहीं दिया गया। सांसद के मुताबिक, विकास कार्यों से जुड़े सवालों और दस्तावेजों की मांग के बावजूद उन्हें संतोषजनक जानकारी नहीं मिली।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ नगर निगमों में पूरी टेंडर प्रक्रिया पूरी किए बिना विकास कार्य शुरू किए गए और भुगतान भी किया गया। बाद में औपचारिकताएं पूरी किए जाने का आरोप है। सांसद का कहना है कि जब उन्होंने इससे जुड़े दस्तावेज मांगे तो भी उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
दूसरी ओर रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल का मामला अलग है। उनका आरोप है कि स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के साथ फोन पर बातचीत के दौरान उनके साथ कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया गया। अग्रवाल के मुताबिक बातचीत के दौरान उन्हें कथित रूप से ‘जो करना है कर लो’ जैसी बात कही गई।
बृजमोहन अग्रवाल ने इस मामले को केवल व्यक्तिगत अपमान का विषय नहीं माना, बल्कि इसे सांसद के विशेषाधिकारों से जोड़ते हुए लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष शिकायत दर्ज कराई।
लोकसभा सचिवालय ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित मंत्रालय से तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की है।
इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी बृजमोहन अग्रवाल के समर्थन में सामने आए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन अगर किसी सांसद के साथ इस तरह का व्यवहार हुआ है तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक विषय है।
यहां कुछ समय के लिए सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक सीमाएं धुंधली होती दिखाई देती हैं। एक ओर सत्ता पक्ष के सांसद अधिकारियों के खिलाफ शिकायत कर रहे हैं, वहीं विपक्ष के वरिष्ठ नेता भी सांसद के सम्मान और अधिकारों के सवाल पर उनके साथ खड़े नजर आ रहे हैं।
भारतीय लोकतंत्र में प्रशासनिक अधिकारी और निर्वाचित जनप्रतिनिधि दोनों महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, लेकिन उनकी भूमिकाएं अलग-अलग हैं। अधिकारी संविधान, कानून, नियम और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार काम करते हैं, जबकि सांसद और विधायक जनता के प्रति राजनीतिक रूप से जवाबदेह होते हैं।
सांसद और विधायक केवल कानून बनाने के लिए नहीं चुने जाते। अपने क्षेत्र की समस्याओं को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाना भी उनकी जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि कोई सांसद यह आरोप लगाता है कि उसके फोन नहीं उठाए जा रहे, पत्रों का जवाब नहीं दिया जा रहा या जनहित के मुद्दों पर जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही, तो इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिकायत करने वाले दोनों सांसद उसी राजनीतिक दल से आते हैं, जिसकी सरकार राज्य और केंद्र दोनों जगह है। सामान्य परिस्थितियों में ऐसी स्थिति में राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय की उम्मीद की जाती है।
लेकिन जब उसी दल के दो सांसद लोकसभा अध्यक्ष तक अधिकारियों के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की शिकायत लेकर पहुंचते हैं, तो यह प्रशासनिक कार्यप्रणाली और राजनीतिक नेतृत्व के बीच संबंधों पर सवाल जरूर खड़े करता है।
छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक नक्सलवाद हावी होता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था में ऐसा माहौल बन रहा है, जहां निर्वाचित जनप्रतिनिधि खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं? या फिर यह राजनीतिक अपेक्षाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच बढ़ती दूरी का परिणाम है?
यदि अधिकारी जनप्रतिनिधियों से संवाद नहीं करेंगे तो जनता की समस्याओं को शासन तक पहुंचाने में बाधा आएगी। वहीं यदि जनप्रतिनिधि प्रशासनिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर निर्णयों पर दबाव बनाने लगेंगे तो संस्थागत संतुलन प्रभावित हो सकता है।
इसी संतुलन को बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी जरूरत है। अधिकारी और जनप्रतिनिधि एक-दूसरे के विकल्प नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था के अलग-अलग हिस्से हैं। दोनों के बीच सम्मान, संवाद और जवाबदेही जरूरी है।
इतना तय है कि यह विवाद अब केवल दो सांसदों और कुछ अधिकारियों के बीच का मामला नहीं रह गया है। इसने छत्तीसगढ़ की राजनीति के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों और प्रशासनिक तंत्र के बीच भरोसे की वह कड़ी कमजोर पड़ रही है, जिस पर पूरी शासन व्यवस्था टिकी होती है?







