विकास की कुल्हाड़ी या आदिवासी विनाश? अडानी की बिजली, आदिवासियों का अंधेरा

Madhya Bharat Desk
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सिंगरौली में एक बार फिर विकास की कुल्हाड़ी चल रही है और इस बार निशाने पर हैं छह लाख पेड़ और आठ गांवों का भविष्य। मध्यप्रदेश का सिंगरौली, जिसे देश का पावर कैपिटल कहा जाता है, आज खुद सांसों के संकट से जूझ रहा है। कोयले और जंगल की इस जंग में आमने-सामने हैं अडानी और आदिवासी। फर्क सिर्फ इतना है कि एक तरफ मुनाफे का पावर है और दूसरी तरफ जल-जंगल-जमीन से जुड़ा जीवन। सवाल यही है कि क्या विकास का रास्ता आदिवासियों को उजाड़कर ही निकलता है।

सिंगरौली की यह कहानी नई नहीं है। इसकी नींव 1962 में पड़ी थी, जब रिहंद नदी पर बांध बना और जवाहरलाल नेहरू ने इसे आधुनिक भारत का मंदिर कहा। तब स्थानीय आदिवासियों से वादा किया गया था कि सिंगरौली भारत का स्विट्जरलैंड बनेगा। 44 साल बाद 2008 में शिवराज सिंह चौहान आए और सिंगरौली को सिंगापुर बनाने का सपना दिखा गए। लेकिन सिंगरौली न स्विट्जरलैंड बना, न सिंगापुर। घने जंगलों की जगह कोयले की खदानें, थर्मल प्लांट की स्लरी और प्रदूषण ने ले ली। जो इलाका कभी हरियाली से पहचाना जाता था, वह आज जहरीली हवा और बीमार लोगों के लिए जाना जाता है।

1984 में यहां पहली बार कोयला खनन शुरू हुआ। नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के बाद 2007 में निजी कंपनियों की एंट्री हुई। कोल ब्लॉकों के आवंटन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, वनाधिकार कानून और पर्यावरण नियम बीच में आए और कई परियोजनाएं अटक गईं। महान के जंगल, जो एशिया के सबसे पुराने और घने जंगलों में गिने जाते हैं, पहले भी खनन के निशाने पर आए लेकिन आदिवासियों के संघर्ष ने उन्हें बचाए रखा। अब वही इतिहास खुद को दोहरा रहा है, फर्क बस इतना है कि इस बार नाम अडानी का है।

2019 में केंद्र सरकार ने 41 कोयला ब्लॉकों की नीलामी की, जिसमें सिंगरौली का घिरौली ब्लॉक अडानी पावर को मिला। लक्ष्य तय किया गया कि 2025 तक यहां से हर साल 6.5 मिलियन टन कोयला निकाला जाएगा। इसकी कीमत है 1400 हेक्टेयर जंगल। यहां साल, तेंदू, महुआ सहित 160 से ज्यादा प्रजातियों के करीब छह लाख पेड़ हैं, जिनमें से लगभग तीन लाख पहले ही काटे जा चुके हैं। यह वही जंगल है जो हाथी, तेंदुए और स्लॉथ बीयर जैसे वन्यजीवों का घर है और आदिवासियों की रोज़ी-रोटी का आधार भी।

सितंबर 2025 में जब अडानी प्रोजेक्ट्स ने घिरौली और आसपास के आठ गांवों में जंगल कटाई शुरू की तो विरोध भड़क उठा। नवंबर तक हालात इतने बिगड़े कि पुलिस बल तैनात करना पड़ा, धारा 144 लगी और प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज हुआ। आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामू टेकाम की गिरफ्तारी ने आग में घी डाल दिया। गांव वालों का कहना है कि जंगल कटने से पानी के स्रोत सूख रहे हैं, प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है और पूरी ज़िंदगी दांव पर लग गई है। दिल्ली में प्रदूषण बढ़ता है तो राष्ट्रीय बहस होती है, लेकिन सिंगरौली के लोग बारहों महीने ज़हरीली हवा में जीने को मजबूर हैं।

इस परियोजना के चलते 14 गांवों के करीब 1700 परिवार विस्थापन के कगार पर हैं। विधानसभा से लेकर सड़क तक विरोध गूंज रहा है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि आदिवासियों की पहचान जल, जंगल और जमीन से है और सरकार उसे कॉरपोरेट के हवाले कर रही है। फैक्ट फाइंडिंग टीमों को रोका गया, सड़क पर धरना देना पड़ा और जंगल में लोकतंत्र की जगह पुलिस ने ले ली। दूसरी ओर पेड़ कटते रहे और ट्रक भर-भरकर जंगल बाहर जाता रहा।

ग्रामीणों का आरोप है कि यह सब Forest Rights Act 2006 और PESA कानून का खुला उल्लंघन है। ग्रामसभा की सहमति को फर्जी बताया जा रहा है। सरकार कहती है कि यहां PESA लागू नहीं होता, क्योंकि आदिवासी आबादी कम है। सवाल यह है कि जब जमीन आदिवासियों की है, जंगल उनकी आजीविका है, तो गिनती किस बात की हो रही है।

अडानी समूह का दावा है कि इसके बदले दूसरे जिलों में करीब 13.97 लाख पौधे लगाए जाएंगे। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि दूसरे जिले में पेड़ लगाने से उनका जंगल वापस नहीं आएगा। यह मुआवजा नहीं, दिखावा है। वन उत्पाद ही यहां के लोगों की 45 से 60 प्रतिशत आय का जरिया हैं। जंगल से दूर होने का मतलब उनके लिए सिर्फ विस्थापन नहीं, बल्कि अस्तित्व का अंत है।

दरअसल यह सिर्फ विकास बनाम पर्यावरण की लड़ाई नहीं है, यह दो सभ्यताओं का टकराव है। एक तरफ मशीनें, ट्रक और मुनाफा है, दूसरी तरफ हजारों सालों से जंगल के साथ सहअस्तित्व में जीने वाला समाज। आदिवासियों ने सदियों तक जंगल को काटकर नहीं, संभालकर जिया है। वे आज भी लकड़ी सिर पर ढोते हैं, इसलिए जंगल बचे रहे। अब वही जंगल ट्रकों पर लादे जा रहे हैं और इसे विकास कहा जा रहा है।

आदिवासी समाज का जीवन जंगल, पहाड़ और नदियों से गहराई से जुड़ा होता है उनकी पूजा-पद्धति और त्योहार अक्सर प्रकृति और कृषि चक्र पर आधारित एवं जंगल गावों के बीच में होता है, जिसे सरकार एवं अडानी द्वारा समाप्त करने की तैयारी की जा चुकी हैं।

सिंगरौली आज पूछ रहा है कि जब देश की बिजली रोशन होती है, तो क्या आदिवासियों की ज़िंदगी का अंधेरा जरूरी है। सरकार और कॉरपोरेट के इस गठजोड़ के बीच जंगल बचेंगे या नहीं, यह साफ नहीं है। फिलहाल इतना तय है कि आदिवासी कह रहे हैं—हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए जो हमें ही मिटा दे। जंगल बचाने की लड़ाई अभी जारी है, लेकिन सवाल है कि सरकार कब सुनेगी और कब तक कुल्हाड़ी चलती रहेगी।

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