आज कांग्रेस पार्टी के भीतर नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के भीतर से उठती आवाज़ों का आरोप है कि बड़े फैसले राहुल गांधी के इर्द-गिर्द मौजूद एक तथाकथित कोटरी (माओवादी) यानी नज़दीकी गुट लेता है।
पार्टी से जुड़े एक पूर्व वरिष्ठ नेता आचार्य प्रमोद कृष्णन ने दावा किया कि कांग्रेस में पद और जिम्मेदारियाँ अब योग्यता या संगठनात्मक मेहनत के आधार पर नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध पर तय होती हैं।
“मोदी को गाली दो, पद पाओ”
आरोप है कि कांग्रेस में मोदी सरकार की आलोचना करने वालों को जल्दी महत्व मिलता है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की तारीफ़ करने वाले नेताओं को वर्किंग कमेटी जैसी अहम समितियों में जगह मिल जाती है।
“भारत विरोधी बयानबाज़ी पर इनाम”
कांग्रेस नेतृत्व पर यह भी आरोप है कि आतंकियों का महिमामंडन करने वाले, भारत की निंदा करने वाले और विदेश में देश के खिलाफ बयान देने वाले नेताओं को और भी बड़े पद दिए जाते हैं।
“सच बोलो, बाहर निकाले जाओ”
सिस्टम के भीतर से निकली आवाज़ का कहना है कि जो नेता सच बोलते हैं या संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हैं, उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार ऐसे आरोपों से कांग्रेस की छवि पर असर पड़ रहा है, खासकर तब जब 2024 लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी अपनी रणनीति नए सिरे से तय करने की कोशिश कर रही है।



