दक्षिण एशिया में तेजी से बदलते राजनीतिक और सामरिक समीकरणों के बीच भारत ने अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूती से स्थापित किया है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के हालिया सम्मेलन में भारत ने उस साझा घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया, जिसमें आतंकवाद पर कोई सीधा उल्लेख नहीं था, विशेषकर जम्मू-कश्मीर के पहलगाम हमले को लेकर। यह स्पष्ट संकेत है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समझौते के बजाय अपनी प्राथमिकताओं और राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि मान रहा है।
भारत की यह स्पष्ट नीति वैश्विक विश्लेषकों द्वारा एक नई विदेश नीति के रूप में देखी जा रही है, जिसमें आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता और संप्रभुता जैसे मुद्दों पर कोई नरमी नहीं बरती जाएगी। अमेरिका स्थित सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के जेम्स क्लार्क कहते हैं, “भारत अब बहुपक्षीय संगठनों में अपनी बात मजबूती से रख रहा है, न कि केवल मौजूद रहने के लिए आता है।”
भारत क्षेत्रीय स्थिरता का मुख्य स्तंभ बनकर उभरा है। कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के विश्लेषक एश्ले जे. टेलिस के अनुसार, अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद उत्पन्न शून्य को भरने में भारत की भूमिका सबसे मजबूत रही है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने में भी भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ऑस्ट्रेलिया के सुरक्षा विशेषज्ञ रॉरी मेडकैफ के अनुसार, भारत ने क्वाड और अन्य वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से अपनी स्थिति को निर्णायक बना लिया है।
भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर है, खासकर रक्षा, अंतरिक्ष, साइबर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में। आईआईएसएस की रिपोर्ट बताती है कि भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि इन क्षेत्रों में एक अग्रणी शक्ति के रूप में उभर रहा है।
भारत की कूटनीति के आगे झुका कनाडा, जिसने 2024-25 की सुरक्षा रिपोर्ट में खालिस्तान समर्थकों की मौजूदगी को स्वीकार किया—जो भारत की आपत्तियों की पुष्टि करता है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब रणनीतिक फैसलों में सिर्फ भागीदार नहीं, बल्कि दिशा देने वाला देश बन गया है। वह दक्षिण एशिया में अब पर्यवेक्षक नहीं, नीति-निर्माता की भूमिका में है।






