कैंसर अब सिर्फ एक बीमारी नहीं रहा, यह एक ऐसी मार बन चुका है जिसने अनगिनत परिवारों को कर्ज, लाचारी और बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है। इलाज शुरू होने से पहले ही मरीज दवाओं के खर्च में टूट जाते हैं—और यह दर्द सिर्फ बीमारी का नहीं, सिस्टम की बेरहमी का भी है।
हकीकत चौंकाने वाली है।
ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अनुज बताते हैं कि Paclitaxel जैसी जीवनरक्षक कैंसर दवा, जो थोक में रिटेलर को मात्र ₹600 में मिलती है, बाजार में उसकी MRP ₹12,000 तक लिखी जाती है।
कई मरीजों को इस दवा के 20–30 वायल तक लगाने पड़ते हैं।
मतलब इलाज अस्पताल में नहीं, जेब पर होने वाले हमले से ही शुरू हो जाता है—यह इलाज नहीं, आर्थिक नरसंहार जैसा है।
और Paclitaxel ही क्यों?
कई कीमोथेरेपी दवाओं पर 1200%–1900% तक मुनाफा कमाया जा रहा है।
क्या जान बचाने वाली दवाओं को भी व्यापार का सामान बना दिया गया है?
अब सवाल साफ हैं और सीधे सरकार से:
दवाओं पर कड़ा नियंत्रण कब होगा?, NPPA और ड्रग कंट्रोलर आखिर कर क्या रहे हैं?, क्या गरीब मरीजों की जिंदगी का कोई मूल्य नहीं?, क्या इलाज एक ऐसा बिज़नेस बन चुका है जहाँ मानवता की कोई जगह नहीं?
कैंसर से कम, दवाओं की लूट से ज्यादा लोग मर रहे हैं।
यह बीमारी नहीं, सिस्टम की बेरहम नीतियों की कीमत है।
जवाबदेही कौन लेगा—और कब तक?



