मध्य प्रदेश सरकार ने इस वर्ष गेहूं और धान की सरकारी खरीदी से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस संबंध में केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को पत्र लिखते हुए कहा है कि प्रदेश अब गेहूं-धान की खरीदी नहीं कर सकेगा और यह जिम्मेदारी केंद्र सरकार अपने हाथों में ले। पत्र में बताया गया है कि राज्य सरकार पर फिलहाल नागरिक आपूर्ति निगम (नान) के माध्यम से 77,000 करोड़ रुपए का भारी-भरकम कर्ज़ हो गया है, जिसकी वजह से आगे खरीदी करना आर्थिक रूप से संभव नहीं है।
दरअसल, प्रदेश में 1999 से गेहूं और 2007 से धान की विकेंद्रीकृत खरीदी व्यवस्था लागू है। इस व्यवस्था के तहत राज्य सरकार किसानों से अनाज खरीदती है और फिर उसे भारतीय खाद्य निगम (FCI) को सौंप देती है। लेकिन इस प्रक्रिया में परिवहन, भंडारण, रखरखाव और ब्याज का पूरा खर्च राज्य सरकार को उठाना पड़ता है। यही कारण है कि समय के साथ यह प्रणाली राज्य के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है।
सरकार के अनुसार, तीन प्रमुख वजहों से यह निर्णय लिया गया है।
पहली वजह यह है कि राज्य में खरीदी तो ज्यादा होती है लेकिन स्थानीय खपत बहुत कम है। उदाहरण के लिए, इस साल प्रदेश ने 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा, जबकि उसमें से केवल 20 लाख मीट्रिक टन ही प्रदेश के राशन वितरण में इस्तेमाल हुआ। शेष 58 लाख मीट्रिक टन अनाज अतिरिक्त रह गया, जिसे बाद में एफसीआई को सौंपना पड़ा।
दूसरा कारण है केंद्र से मिलने वाली देरी और अधूरी प्रतिपूर्ति (Reimbursement)। केंद्र सरकार की ओर से भुगतान की प्रक्रिया में 2 से 3 साल लग जाते हैं और तब भी पूरी राशि नहीं मिलती। राज्य सरकार को केवल 90 से 95 प्रतिशत ही रकम वापस मिलती है, क्योंकि कई खर्चों पर केंद्र और राज्य के बीच सहमति नहीं बन पाती।
तीसरा कारण है कर्ज का बढ़ता बोझ। इस साल केवल गेहूं खरीदी पर ही राज्य ने 20,000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है, जबकि पिछले साल धान पर 10,000 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। अनुमान है कि इस साल भी धान खरीदी पर इतनी ही राशि खर्च होगी। यानी एक फसल चक्र में लगभग ₹30,000 करोड़ रुपये का नया कर्ज़ बन जाता है, जिसकी वापसी भी 2-3 साल बाद कटौती के साथ होती है।
मुख्यमंत्री ने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि प्रदेश में पिछले वर्षों में उपार्जन लगातार बढ़ा है — गेहूं का उपार्जन 77.74 लाख मीट्रिक टन और धान का 43.49 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। लेकिन स्टॉक के निपटान में देरी और भुगतान में विलंब से सरकार पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है।
राज्य सरकार का कहना है कि यदि केंद्र इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है तो अगली खरीदी में एफसीआई सीधे किसानों से खरीद करेगा। हालांकि सरकार का दावा है कि इस व्यवस्था के बदलाव से किसानों या जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन जानकारों का कहना है कि एफसीआई के गुणवत्ता मानक बेहद सख्त हैं, जिससे बड़ी संख्या में किसानों की उपज रिजेक्ट हो सकती है और उन्हें अपनी मेहनत की उचित कीमत नहीं मिल पाएगी।
इस प्रकार, यह निर्णय आर्थिक विवशता और प्रणालीगत दिक्कतों का परिणाम है, जो एक ओर सरकार के वित्तीय संतुलन को राहत दे सकता है, लेकिन दूसरी ओर किसानों के हितों पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव पर अब बहस शुरू हो चुकी है।







