छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लैब टेक्नीशियनों को अब मिलेगा समान वेतन, ₹2800 ग्रेड पे बहाल”

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने “समान कार्य समान वेतन” के सिद्धांत को सुदृढ़ करते हुए लैब टेक्नीशियनों के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति दीपक कुमार तिवारी की एकलपीठ ने यह आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि जब कर्मचारियों का कार्य, योग्यता और जिम्मेदारी समान हो, तो उन्हें अलग-अलग वेतन देना न्याय और समानता के सिद्धांतों के विपरीत है।

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सभी लैब टेक्नीशियनों को ₹2800 ग्रेड पे प्रदान किया जाए तथा पिछली तिथि से वेतन संशोधन कर बकाया राशि ब्याज सहित दी जाए। यह आदेश उन कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जिन्हें अब तक ₹2400 ग्रेड पे दिया जा रहा था।

मामले की पृष्ठभूमि में यह तथ्य सामने आया कि 2 मई 2014 को जारी भर्ती विज्ञापन में लैब टेक्नीशियन के 26 पदों के लिए वेतनमान ₹5200–20200 और ₹2800 ग्रेड पे निर्धारित किया गया था। हालांकि, चयन के बाद जारी नियुक्ति आदेशों में ग्रेड पे घटाकर ₹2400 कर दिया गया, जिसे याचिकाकर्ताओं ने मनमाना और असंवैधानिक बताया। उन्होंने तर्क दिया कि यह परिवर्तन अनुच्छेद 14 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

अधिवक्ता मतिन सिद्दीकी द्वारा दायर इस याचिका में अधिवक्ता दानिश सिद्दीकी ने याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रभावी पैरवी की। उन्होंने बताया कि राज्य के अन्य चिकित्सा संस्थानों में समान योग्यता वाले लैब टेक्नीशियनों को पहले से ही ₹2800 ग्रेड पे दिया जा रहा है, ऐसे में कुछ कर्मचारियों को कम वेतन देना स्पष्ट भेदभाव है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि अन्य मेडिकल कॉलेजों में लैब टेक्नीशियनों को ₹2800 ग्रेड पे पहले से दिया जा रहा है। अदालत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “यह समझ से परे है कि एक ही पद के लिए दो अलग-अलग वेतन संरचनाएं कैसे निर्धारित की जा सकती हैं।”

इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ चिकित्सा शिक्षा विभाग अधीनस्थ सेवा भर्ती नियम 2015 के अनुसार लैब टेक्नीशियन का ग्रेड पे ₹2800 ही तय किया गया है। न्यायालय ने ₹2400 ग्रेड पे को नियमों के विरुद्ध और अनुचित बताया।

इस फैसले के बाद राज्य के हजारों लैब टेक्नीशियनों को समान वेतन का लाभ मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यह निर्णय न केवल समानता के संवैधानिक अधिकार की पुन: पुष्टि करता है बल्कि राज्य सरकार के लिए भी यह संदेश देता है कि समान कार्य करने वालों को समान वेतन देना ही न्याय का वास्तविक स्वरूप है।

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