जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है।
“द लैंसेट काउंटडाउन 2025” की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती गर्मी से हर मिनट एक व्यक्ति की जान जा रही है, जबकि गरीब देशों की आय में औसतन छह फीसदी की कमी दर्ज की गई है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया अब जलवायु संकट के सबसे गंभीर चरण में पहुंच चुकी है। वर्ष 2024 में अत्यधिक तापमान के कारण 639 अरब श्रम घंटे का नुकसान हुआ, जिससे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भारी झटका लगा। लगातार बढ़ती यह गर्मी मानव स्वास्थ्य और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए खतरे की घंटी बन गई है।
गर्मी से मौतों में 23% की बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार 1990 के दशक के बाद से गर्मी से होने वाली मौतों में 23% की वृद्धि हुई है। 2012 से 2021 के बीच हर साल औसतन 5.46 लाख लोगों की मौत केवल गर्मी के कारण हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि ये मौतें रोकी जा सकती हैं, यदि सरकारें समय पर ठोस जलवायु नीतियाँ लागू करें।
पिछले चार वर्षों में औसतन हर व्यक्ति को 19 दिन खतरनाक गर्मी झेलनी पड़ी, जिनमें से 16 दिन मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग का परिणाम थे। अत्यधिक तापमान के चलते श्रम क्षमता घट रही है, जिसका सीधा असर गरीब देशों की उत्पादकता और आय पर पड़ रहा है।
जीवाश्म ईंधनों से बढ़ रहा खतरा
रिपोर्ट बताती है कि कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन न केवल धरती का तापमान बढ़ा रहे हैं बल्कि प्रदूषण के जरिए हर साल लाखों लोगों की जान भी ले रहे हैं।
वर्ष 2023 में सरकारों ने इन उद्योगों को 956 अरब डॉलर की सब्सिडी दी — यानी प्रतिदिन करीब 2.5 अरब डॉलर। रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 देशों ने इन ईंधनों पर अपने स्वास्थ्य बजट से भी ज्यादा खर्च किया। इनमें सऊदी अरब, मिस्र, वेनेजुएला और अल्जीरिया जैसे देश शामिल हैं।
जंगल की आग और खाद्य संकट ने बढ़ाई चिंता
2024 में दक्षिणी यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में भीषण जंगल की आग ने तबाही मचाई। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीस, स्पेन और कनाडा में स्थिति सबसे भयावह रही — लाखों हेक्टेयर जंगल जल गए और करीब 1.54 लाख लोग मारे गए या बीमार पड़े।
कनाडा में इतिहास की सबसे बड़ी आग ने 1.8 करोड़ हेक्टेयर जंगल को खाक कर दिया, जबकि ग्रीस में लगातार 40 डिग्री तापमान ने आग पर काबू पाना लगभग असंभव बना दिया।
वहीं खाद्य संकट भी बढ़ता जा रहा है — 2023 में दुनियाभर में 12.3 करोड़ अतिरिक्त लोग खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे थे, जो पिछले दशकों की तुलना में कहीं अधिक है।
विशेषज्ञों की चेतावनी:
अगर सरकारें और समाज जलवायु परिवर्तन के खिलाफ ठोस कदम नहीं उठाते, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और विकराल रूप ले सकता है।







