पाकिस्तान का दोहरा चरित्र: I Love Mohammad से I Love Abraham तक

Madhya Bharat Desk
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                                                 – नागेंद्र पाण्डेय, संपादक

पाकिस्तान, जिसने दशकों तक स्वयं को इस्लामी उम्मा का स्वयंभू ठेकेदार और फिलिस्तीनी अधिकारों का सबसे बड़ा समर्थक घोषित किया, आज अपनी ही घोषित नीतियों से पीछे हटता दिख रहा है। उसकी विदेश नीति का केंद्र बिंदु हमेशा से फिलिस्तीन का समर्थन और इज़राइल का विरोध रहा है। लेकिन अब, अंतरराष्ट्रीय दबावों और गहरी आर्थिक बदहाली के बीच, ऐसा प्रतीत होता है कि इस्लामाबाद चुपके से एक नई दिशा अपना रहा है। कभी पाकिस्तान हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘इस्लामी भाईचारे’ और ‘उम्मा की एकता’ का झंडा बुलंद करता था – जिसे प्रतीकात्मक रूप से “I Love Mohammad” के नारे से समझा जा सकता है। आज, वही देश, धीरे-धीरे “I Love Abraham” की ओर कदम बढ़ा रहा है। इसका सीधा और स्पष्ट अर्थ है: पाकिस्तान अब्राहम समझौते (Abraham Accords) के प्रभाव क्षेत्र में आने को तैयार हो रहा है। यह वही समझौता है जिसके तहत कई अरब देशों ने इज़राइल के साथ अपने संबंधों को सामान्य कर लिया, और इस प्रक्रिया में, फिलिस्तीनी मुद्दे को अपनी विदेश नीति की प्राथमिकता सूची से नीचे खिसका दिया।

यह बदलाव महज़ राजनीतिक दाँव-पेंच नहीं, बल्कि गंभीर आर्थिक तंगी और क्षेत्रीय भू-राजनीति में आए मूलभूत बदलावों का सीधा परिणाम है। यह दिखाता है कि इस्लामी एकता का नारा डॉलर की ज़रूरतों के सामने ध्वस्त हो चुका है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर ऋण संकट के दौर से गुज़र रही है और अपनी वित्तीय स्थिरता के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) पर अत्यधिक निर्भर है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार अक्सर इतना घट जाता है कि उसे दिवालिया होने के कगार से बचाने के लिए अरब देशों से त्वरित नकद जमा और आस्थगित भुगतान पर तेल की आवश्यकता होती है। पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए मुख्य रूप से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से जमा राशि और सॉफ्ट लोन पर निर्भर है। जब ये दोनों प्रमुख मुस्लिम और आर्थिक शक्तियां स्वयं अब्राहम समझौतों की मुख्य हस्ताक्षरकर्ता या समर्थक बन चुके हैं, तो पाकिस्तान के लिए इज़राइल के पूर्ण विरोध की नीति को बनाए रखना आर्थिक आत्महत्या के समान हो जाता है।

क्षेत्रीय दबाव की बात करें तो, यूएई, बहरीन, सूडान और मोरक्को द्वारा इज़राइल को मान्यता देने के बाद, मध्य पूर्व की पूरी भू-राजनीतिक तस्वीर बदल चुकी है। सऊदी अरब, जो मुस्लिम जगत में पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण संरक्षक माना जाता रहा है, भी अब पर्दे के पीछे से इज़राइल के साथ संबंधों के सामान्यीकरण की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। ऐसे में, पाकिस्तान की पुरानी ‘हम फिलिस्तीन के साथ हैं’ की नीति मुस्लिम जगत में ही अकेली और अप्रभावी बन गई है। इसके अतिरिक्त, इज़राइल के साथ भारत के गहरे होते रक्षा और खुफिया संबंध भी पाकिस्तान पर दबाव डालते हैं। अमेरिका इन समझौतों का सूत्रधार है, जिससे पश्चिमी देशों से समर्थन पाने के लिए पाकिस्तान को अमेरिकी विदेश नीति के अनुरूप चलना आवश्यक हो गया है। पाकिस्तान के लिए अपने पारंपरिक ‘एंटी-इज़राइल’ रुख पर अड़े रहना अब अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में एक महंगा सौदा साबित हो रहा है।

दशकों तक पाकिस्तान ने अपने नागरिकों को ‘कश्मीर’ और ‘फिलिस्तीन’ के लिए संघर्ष करने का पाठ पढ़ाया। उसकी राष्ट्रीय चेतना का एक बड़ा हिस्सा इसी नैरेटिव पर टिका था। लेकिन आज, जब देश का नेतृत्व अब्राहम की ओर देख रहा है, तो सवाल उठता है कि क्या यह मुसलमान को मुसलमान से धोखा नहीं है? पहले पाकिस्तान का मूल विचार था: “हम मोहम्मद के नाम पर बने हैं।” अब, उसकी नई दिशा का संकेत है: “हम अब्राहम के साथ खड़े हैं।” यह वैचारिक पलटी दिखाती है कि पाकिस्तान की विदेश नीति की बुनियाद कितनी कमज़ोर थी। उसकी तथाकथित ‘इस्लामी विदेश नीति’ केवल चंदा और कर्ज़ हासिल करने का एक राजनीतिक हथियार थी, न कि वास्तविक वैचारिक प्रतिबद्धता।

आज का पाकिस्तान अपने ही ऐतिहासिक नारों और प्रतिबद्धताओं को दफ़ना चुका है। जहाँ कभी ‘कश्मीर और फिलिस्तीन’ उसकी नीति का केंद्र थे, वहीं आज ‘I Love Abraham’ कहकर वह अपनी नीयत और नीति दोनों बदल चुका है। यह केवल पाकिस्तान का पाखंड नहीं है। यह उस पूरी इस्लामी दुनिया के खोखलेपन का प्रमाण है, जहाँ “उम्मा की एकता” की बातें महज़ एक दिखावा बन कर रह गई हैं। जब मुस्लिम देश स्वयं आर्थिक लाभ के लिए अपने लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक स्टैंड से पीछे हटते हैं, तो यह सिद्ध होता है कि इस्लामी भाईचारा डॉलर और तेल के समझौतों के सामने घुटने टेक चुका है। पाकिस्तान का यह बदलाव, आने वाले समय में इस्लामी दुनिया की एकता के लिए एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

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