सुप्रीम कोर्ट: चेक बाउंस मामलों का बोझ कम करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी

Madhya Bharat Desk
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नई दिल्ली। देश की जिला अदालतों में चेक बाउंस मामलों की लगातार बढ़ती संख्या पर उच्चतम न्यायालय ने गंभीर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को जल्द निपटाने और न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते बोझ को कम करने के लिए नए संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने साफ कहा कि निचली अदालतों में परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act – NI Act) की धारा 138 के तहत लंबित मामलों की स्थिति बेहद चिंताजनक है और तुरंत समाधान की जरूरत है।

15 साल पुराने दिशा-निर्देशों में बदलाव

न्यायमूर्ति मनमोहन और एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पिछले 15 वर्षों में जारी दिशा-निर्देश अब मौजूदा परिदृश्य में प्रभावी नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों की जिला अदालतों में चेक बाउंस मामलों का ढेर लगातार बढ़ता जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के नए संशोधित दिशा-निर्देश

  1. गवाही से पहले भुगतान: यदि आरोपी बचाव पक्ष की गवाही दर्ज होने से पहले चेक की राशि चुका देता है, तो अदालत बिना किसी जुर्माने या अतिरिक्त लागत के मामले का निपटारा कर सकती है।
  2. फैसले से पहले भुगतान: यदि भुगतान गवाही दर्ज होने के बाद लेकिन फैसला सुनाए जाने से पहले किया जाता है, तो आरोपी को चेक राशि के साथ 5% अतिरिक्त राशि न्यायालय या विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा करनी होगी।
  3. अपील या पुनरीक्षण के दौरान भुगतान: यदि भुगतान सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में अपील/पुनरीक्षण के दौरान किया जाता है, तो आरोपी को चेक राशि पर 7.5% अतिरिक्त खर्च के रूप में देना होगा।
  4. परिवीक्षा पर रिहाई: अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामलों में समझौते या भुगतान के बाद अभियुक्त को परिवीक्षा (प्रोबेशन) पर रिहा किया जा सकता है।

लंबित मामलों का भारी आंकड़ा

काष्टीर नायिका डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) के मुताबिक:

  • दिल्ली की जिला अदालतों में – 6,50,283 मामले लंबित
  • मुंबई जिला अदालतों में – 1,17,190 मामले लंबित
  • कोलकाता जिला अदालतों में – 2,65,985 मामले लंबित

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि केवल दिल्ली में ही एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत लंबित मामलों की संख्या कुल लंबित मामलों का 49.45% है।

न्यायपालिका पर दबाव

शीर्ष अदालत ने कहा कि इन लंबित मामलों के कारण न्यायिक प्रणाली पर अभूतपूर्व दबाव पड़ रहा है। कुछ राज्यों में तो निचली अदालतों में आधे से ज्यादा केस केवल चेक बाउंस से जुड़े हैं। अदालत ने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में ब्याज दरों में गिरावट और मामलों की भारी संख्या देखते हुए, समझौते और समय पर भुगतान को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि नए दिशा-निर्देशों से न केवल मामलों का निपटारा तेज़ी से होगा, बल्कि अदालतों पर बोझ भी काफी हद तक कम हो सकेगा।

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