नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने बाल विवाह की वैधता को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ और भारतीय कानूनों के बीच मौजूद टकराव पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति अरुण मोंगा की बेंच ने कहा कि मुस्लिम कानून में 15 साल की उम्र को विवाह योग्य मान लिया जाता है, जबकि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और पाक्सो एक्ट के तहत यह अपराध की श्रेणी में आता है।
अदालत ने टिप्पणी की कि अब सवाल उठता है—क्या समय आ गया है कि पूरे देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू किया जाए, ताकि व्यक्तिगत कानून या परंपराएं राष्ट्रीय कानूनों पर हावी न हों। कोर्ट ने संसद से स्पष्ट विधायी समाधान लाने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि यह मुद्दा बार-बार विवाद का कारण बन रहा है।
हाई कोर्ट ने यह भी माना कि धार्मिक स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह मान्य हो सकता है, लेकिन बाल विवाह पर एक सख्त और स्पष्ट राष्ट्रीय नीति बनाना अब बेहद जरूरी है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पर्सनल लॉ, बीएनएस और पाक्सो से ऊपर नहीं हो सकता। यदि विवाह को अवैध भी माना जाए तो दोनों के बीच का रिश्ता सहमति से बना था, जो लिव-इन रिलेशनशिप जैसा है। अब दोनों वयस्क हैं और कानूनी अधिकारों के तहत साथ रह सकते हैं।
यह टिप्पणी कोर्ट ने 24 वर्षीय युवक की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दी। उस पर नाबालिग लड़की से विवाह और दुष्कर्म का आरोप था। लड़की ने अदालत में खुद को 20 साल बताया, जबकि अभियोजन पक्ष ने उसकी उम्र 15-16 वर्ष बताई थी। वह पहले भी 14 साल की उम्र में यौन शोषण का शिकार हुई और मां बनी थी। बाद में उसने आरोपी युवक से मुस्लिम कानून के तहत विवाह किया और दोनों के एक बच्चा भी है।
हाई कोर्ट ने आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के समय उसे लिखित कारण नहीं बताए गए थे, जो संविधान के अनुच्छेद 22 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 47 का उल्लंघन है।







