असम इस समय औद्योगिक निवेश और विकास योजनाओं को लेकर सुर्खियों में है। अडानी समूह की परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण ने राज्य में विकास और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच गहरी खाई पैदा कर दी है। जहां सरकार निवेश को रोजगार और बुनियादी ढांचे के विस्तार का माध्यम बता रही है, वहीं प्रभावित समुदाय विस्थापन और अधिकार हनन को लेकर आंदोलित हैं।
भूमि अधिग्रहण का विवाद:
दीमा हसाओ जिले के उमरांगसो क्षेत्र में अडानी समूह को 9,000 बीघा आदिवासी भूमि दिए जाने ने सबसे ज्यादा विवाद खड़ा किया है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह उनकी परंपरागत जमीन है, जिस पर उनका सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार है। इस कदम पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी सवाल उठाए हैं और प्रशासन से जवाब माँगा है।
विस्थापन और सामाजिक असर:
अडानी समूह ने असम में ₹50,000 करोड़ के निवेश की योजना बनाई है। इसके तहत कई परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण जारी है। धुबरी और गोलपाड़ा जिलों में 4,000 बीघा और कोकराझार में 3,400 बीघा जमीन थर्मल पावर प्लांट के लिए अधिग्रहित की जा रही है। इन इलाकों से स्वदेशी और मुस्लिम समुदाय के बड़े पैमाने पर विस्थापन का खतरा बढ़ गया है। लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार से अपने अधिकार सुरक्षित रखने की मांग कर रहे हैं।
सरकार की सफाई:
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने स्पष्ट किया है कि गुवाहाटी हवाई अड्डे के पास अधिग्रहित 500 बीघा भूमि अडानी समूह के लिए नहीं, बल्कि स्टेडियम और कन्वेंशन सेंटर जैसी सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार किसी भी कॉरपोरेट समूह को अंधाधुंध जमीन नहीं दे रही है और अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की।







