मुंबई – हिंदी भाषा को अनिवार्य करने के सरकारी प्रयास के विरोध में महाराष्ट्र में जबरदस्त राजनीतिक हलचल देखने को मिल रही है। इसी सिलसिले में शनिवार को शिवसेना (उद्धव गुट) प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे 23 वर्षों बाद एक साथ एक मंच पर नजर आए। यह मुलाकात न सिर्फ राजनीतिक दृष्टि से अहम रही, बल्कि हिंदी विरोध के स्वर को नई धार देने वाली साबित हुई।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर प्रतिक्रिया दी कि जिस विरोध की चिंगारी डीएमके और तमिलनाडु से उठी थी, वह अब महाराष्ट्र में प्रचंड बवंडर बन चुकी है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की “हिंदी थोपने की नीति” के खिलाफ यह आंदोलन अब राज्यों की सीमाओं को लांघ चुका है।
स्टालिन ने महाराष्ट्र सरकार पर हमला करते हुए कहा कि जब लोगों का दबाव बढ़ा तो उसे स्कूलों में हिंदी अनिवार्य करने संबंधी दोनों आदेश वापस लेने पड़े। हालांकि इसके बावजूद ठाकरे भाइयों ने 5 जुलाई को विजय रैली निकालने का फैसला बरकरार रखा।
रैली में उद्धव ठाकरे ने कहा कि राज उनके साथ सिर्फ मंच साझा करने नहीं बल्कि आवाज़ बुलंद करने आए हैं। वहीं, राज ठाकरे ने आरोप लगाया कि केंद्र त्रिभाषा नीति के जरिए महाराष्ट्र की पहचान और भाषा संस्कृति को कमजोर करना चाहता है।
राज ठाकरे ने सवाल उठाया कि जब उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों में कोई तीसरी भाषा अनिवार्य नहीं की जाती, तो महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों पर जबरन हिंदी थोपने की कोशिश क्यों?
स्टालिन ने केंद्र की भाषा नीति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि तमिलनाडु ने इस जबरदस्ती के खिलाफ बुद्धिमत्ता, तर्क और जनसंघर्ष से विरोध किया है और अब महाराष्ट्र की आवाज़ से शायद केंद्र की आंखें खुलें।



