मध्यप्रदेश में किसान अब सिर्फ मौसम की मार ही नहीं झेल रहा, बल्कि सरकारी नीतियों के दबाव में भी टूटता नजर आ रहा है। जिस व्यवस्था को किसानों का सहारा बनना चाहिए था, वही अब उन्हें बाजार के भरोसे छोड़ती दिखाई दे रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि खरीद कम और शर्तें ज्यादा होने से गेहूं खरीदी प्रक्रिया इतनी उलझ गई है कि किसान मजबूरी में अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर है।
इस पूरे मुद्दे पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सरकार को घेरा है। उनका कहना है कि अगर सरकार खुद को किसान हितैषी बताती है, तो खरीद प्रक्रिया समय पर शुरू क्यों नहीं हुई और तारीखें बार-बार क्यों बढ़ानी पड़ीं। देरी का सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ा, क्योंकि हर किसान के लिए फसल को लंबे समय तक रोक पाना संभव नहीं होता।
स्थिति और गंभीर तब हो जाती है जब दो हेक्टेयर से ज्यादा जमीन वाले किसानों को खरीद प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या बड़े किसान अब किसान नहीं माने जाएंगे? या फिर सरकार जानबूझकर खरीदी का दायरा सीमित कर रही है ताकि आंकड़ों में सब कुछ संतुलित दिखे, जबकि जमीनी सच्चाई कुछ और हो।
बार-बार वेरिफिकेशन और लंबी कागजी प्रक्रिया ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है। जिन्हें समय पर भुगतान और समर्थन मूल्य मिलना चाहिए था, वे दस्तावेजों और औपचारिकताओं में उलझ गए। नतीजा यह रहा कि बड़ी मात्रा में गेहूं खुले बाजार में कम कीमत पर बिक गया, जो किसानों के लिए सीधा आर्थिक नुकसान है।
मंडी स्तर पर भी हालात चिंताजनक हैं। तौल में गड़बड़ी, यानी बटतोल की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, जहां एक क्विंटल में 2 से 5 किलो तक अतिरिक्त तौल का दबाव किसानों पर डाला जा रहा है। यह सीधे तौर पर किसानों की जेब पर असर डाल रहा है। सवाल उठता है कि क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि किसानों का भरोसा अब सिस्टम से उठता दिख रहा है। जब नीति बनाने वालों और किसानों के बीच विश्वास खत्म होने लगे, तो यह सिर्फ एक योजना की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता मानी जाती है।
कमलनाथ ने सवाल उठाया है कि आखिर क्यों लाखों किसान खरीदी के दायरे से बाहर रह गए और उन्हें समर्थन मूल्य का लाभ नहीं मिल पाया। उन्होंने मांग की है कि सरकार इस पूरे मामले पर जवाब दे और किसानों को राहत देने के लिए ठोस कदम उठाए।
यह मुद्दा केवल गेहूं खरीदी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सोच को भी दर्शाता है जिसमें किसान को प्राथमिकता देने के बजाय एक बोझ की तरह देखा जा रहा है। अगर यही हालात रहे, तो आने वाले समय में किसान सिर्फ उत्पादन करेगा और लाभ किसी और को मिलेगा।


