बीजापुर में हाल ही में एक निजी गोदाम में भीषण आग लग गई, जहां लघु वनोपज संघ की बीजापुर इकाई ने तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए जगह किराए पर ली थी। इस आग में करीब 10 करोड़ रुपए का तेंदूपत्ता जलकर पूरी तरह नष्ट हो गया।
इसी तरह अगले ही दिन जगदलपुर के पास रणसरगीपाल स्थित काष्ठागार डिपो में भी आग लगने की घटना सामने आई, जिसमें लगभग 10 लाख रुपए का तेंदूपत्ता जलकर राख हो गया।
बीजापुर वाले मामले के बाद वन मंत्री केदार कश्यप ने नाराजगी जताते हुए डीएफओ रमेश जांगड़े को तुरंत हटा दिया और उन्हें रायपुर मुख्यालय अटैच कर दिया। उनकी जगह लघु वनोपज संघ से जाधव सागर को बीजापुर वन मंडल का जिम्मा सौंपा गया है। उन्हें तेंदूपत्ता का जानकार और अनुभवी बताया जा रहा है।
हालांकि, सवाल यह भी उठ रहे हैं कि जाधव सागर इससे पहले सुकमा में डीएफओ रहते हुए वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बाद लघु वनोपज संघ में अटैच किए गए थे। अब उन्हें फिर से बड़ी जिम्मेदारी देकर बीजापुर भेजा गया है।

लोगों के बीच चर्चा है कि आखिर इस पूरी घटना की असली जिम्मेदारी किसकी है? 10 करोड़ का तेंदूपत्ता, जो आदिवासी संग्राहकों की आमदनी से जुड़ा है, उसका नुकसान किसके खाते में जाएगा?
बताया जा रहा है कि इस बार का तेंदूपत्ता बहुत अच्छी क्वालिटी का था, बड़े और अच्छे पत्तों वाला था। कुछ जानकार यह भी आशंका जता रहे हैं कि बोरों की मात्रा या स्टॉक मैनेजमेंट में गड़बड़ी हो सकती है।

वन विभाग में पहले से ही कई तरह की व्यवस्थाओं और सुविधाओं पर सवाल उठते रहे हैं। बड़े अधिकारियों को बंगले, गाड़ियां, अलग-अलग वाहनों का इस्तेमाल, और भारी खर्च की व्यवस्था पर भी चर्चा होती रहती है। इसके बावजूद इस तरह की बड़ी लापरवाही सामने आना कई सवाल खड़े करता है।
अब सवाल यह है कि क्या सिर्फ तबादला या अटैचमेंट ही इस तरह की घटनाओं का हल है? क्या अधिकारियों की कोई ठोस जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए?
इस पूरे मामले ने एक बार फिर शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। और आम लोगों के बीच यही चर्चा है कि आखिर जिम्मेदारी तय कब होगी—या फिर सिस्टम ऐसे ही चलता रहेगा?




