अंबिकापुर। बिश्रामपुर इलाके में अमेरा कोल माइंस के विस्तार ने एक बार फिर सरकार की विकास परिभाषा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आदिवासी ग्रामीणों का साफ कहना है कि “प्रदेश का मुख्यमंत्री खुद आदिवासी होते हुए भी जल, जंगल और जमीन की रक्षा नहीं कर पा रहे—या शायद अब सत्ता की कुर्सी इन तीन ‘ज’ से ज्यादा ताकतवर हो चुकी है।”
कोल माइंस विस्तार को लेकर विरोध प्रदर्शन उस समय उग्र हो गया जब पुलिस और ग्रामीणों के बीच झड़प हो गई। ग्रामीणों ने लाठी, पत्थर और गुलेल से जवाब दिया और पुलिस ने आँसू गैस व लाठीचार्ज से स्थिति संभालने की कोशिश की। दोनों तरफ के कई लोग घायल हुए।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार ‘आदिवासी हितैषी’ होने के दावे तो करती है, लेकिन जमीन की चाबी कंपनियों के हवाले कर देती है।
एक ग्रामीण ने कटाक्ष करते हुए कहा—
“अगर यह विकास है, तो हमारे जंगल और जमीन बच जाएँ, ये उम्मीद ही अब अविकसित लोगों की है शायद!”
दूसरे ग्रामीण ने और तीखा तंज कसा—
“मुख्यमंत्री जी आदिवासी जरूर हैं, पर शायद भूल गए कि आदिवासी पहचान जंगल के बीच बनती है, न कि फाइलों के बीच।”
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार का तथाकथित विकास मॉडल आदिवासी इलाकों में सिर्फ खनन, धूल और विस्थापन बनकर रह गया है।
विरोध बढ़ने के बाद भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। लेकिन ग्रामीण कहते हैं—
“अगर सरकार को जल-जंगल-जमीन बचाने का मन नहीं, तो कम से कम इसे नष्ट करने में तेजी दिखाने का श्रेय तो ईमानदारी से ले ही सकती है।”


