बस्तर में नक्सलवाद खत्म होने के करीब, 30 मार्च को संसद में बड़ी चर्चा

Madhya Bharat Desk
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कभी गोलियों की आवाज़ और डर के साए में जीने वाला बस्तर अब धीरे-धीरे सुकून और विकास की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। पांच दशकों तक नक्सल हिंसा से जूझने के बाद अब हालात ऐसे बन रहे हैं, जिससे लगता है कि यह संघर्ष अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है।

सरकारी आंकड़ों की मानें तो बस्तर का करीब 96 फीसदी इलाका अब नक्सली प्रभाव से बाहर आ चुका है। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि वर्षों की रणनीति, सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों और स्थानीय लोगों के सहयोग का परिणाम है।

दरअसल, नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन से हुई थी, जिसने धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों में पैर पसारे। बस्तर जैसे घने जंगलों वाले इलाके लंबे समय तक इसका गढ़ बने रहे। इस दौरान हिंसा ने न सिर्फ हजारों जिंदगियां छीनीं, बल्कि विकास की रफ्तार को भी बुरी तरह प्रभावित किया।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर तेजी से बदली है। बीते दो सालों में करीब 3000 नक्सलियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा को अपनाया है। वहीं, 2000 से ज्यादा को गिरफ्तार किया गया और 500 से अधिक नक्सली मारे गए हैं। इस तरह कुल मिलाकर 5000 से ज्यादा नक्सली नेटवर्क कमजोर हुआ है।

अगर जिलों की बात करें तो अब हालात काफी नियंत्रित हैं—दंतेवाड़ा में सिर्फ एक, नारायणपुर में दो, सुकमा में पांच, बीजापुर में 11 और कांकेर में करीब 19 नक्सली सक्रिय बताए जा रहे हैं। ये आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि बस्तर अब निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।

हालांकि, खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। जंगलों में छिपे आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) अब भी सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। पिछले वर्षों में 1200 से ज्यादा आईईडी धमाकों की घटनाएं सामने आई हैं। अच्छी बात यह है कि 4500 से अधिक आईईडी को समय रहते खोजकर निष्क्रिय किया जा चुका है।

सरकार अब बस्तर को पूरी तरह ‘आईईडी मुक्त’ बनाने की दिशा में काम कर रही है, ताकि आम नागरिकों और जवानों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

इसी बीच, नक्सलवाद के खात्मे को लेकर 30 मार्च को लोकसभा में एक अहम चर्चा प्रस्तावित है। इस बहस में अब तक की उपलब्धियों के साथ-साथ बची हुई चुनौतियों और आगे की रणनीति पर गहराई से विचार किया जाएगा।

आज का बस्तर पहले जैसा नहीं रहा। अब यहां सिर्फ डर की कहानियां नहीं, बल्कि उम्मीद, विकास और बदलाव की नई दास्तान लिखी जा रही है। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो वो दिन दूर नहीं जब बस्तर पूरी तरह शांति और प्रगति की पहचान बन जाएगा।

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