“शांति बिल के बहाने अडानी को परमाणु रास्ता?

Madhya Bharat Desk
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नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार ने परमाणु ऊर्जा जैसे संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में निजी कंपनियों के लिए दरवाज़े खोलते हुए ‘शांति’ बिल पेश किया है। सरकार का दावा है कि इससे निवेश आएगा, तकनीक आएगी और देश ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा।

लेकिन सवाल यह है कि निवेश किसका आएगा और आत्मनिर्भर कौन बनेगा?

बिल के पेश होते ही ‘अडानी एटॉमिक एनर्जी लिमिटेड’ नाम की कंपनी के गठन की खबर सामने आती है, और राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी शुरू हो जाती है। आलोचक कहते हैं कि जैसे ही कोई नया सेक्टर खुलता है, वहां सबसे पहले दस्तक किसी आम उद्यमी की नहीं, बल्कि उद्योगपति अडानी के समूह की सुनाई देती है।

पिछले कुछ वर्षों का रिकॉर्ड उठाकर देखें तो बंदरगाह, हवाई अड्डे, कोयला खदानें, बिजली उत्पादन हर बड़े सेक्टर में एक नाम बार-बार उभरता रहा है। विपक्ष तंज कसता है कि अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि “सरकारी नीति बने या बजट आए, लाभार्थी पहले से तय होता है।”

सरकार कहती है कि सब कुछ नियमों के तहत और पारदर्शी प्रक्रिया से हो रहा है। लेकिन विपक्ष पूछता है कि पारदर्शिता अगर इतनी साफ है तो हर नई नीति का रास्ता आखिर एक ही समूह की ओर क्यों मुड़ जाता है?

विपक्ष का सीधा आरोप है कि नीतियां पहले बनती हैं या कंपनियां पहले तैयार हो जाती हैं, यह क्रम अब जनता के लिए पहेली बन चुका है। उनका कहना है कि ‘प्राइवेट सेक्टर’ शब्द अब प्रतीक बन चुका है। “मोदी सरकार अडानी को बढ़ावा दे रही है और सरकार की लगभग हर नई नीति का लाभ आखिरकार उसी समूह को मिलता दिखाई देता है।” उनके अनुसार अब ‘प्राइवेट सेक्टर’ शब्द आम उद्यमियों के लिए कम और ‘विकास’ की परिभाषा भी कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों तक सीमित होती दिखती है।

परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्र में निजी भागीदारी को लेकर सुरक्षा और रणनीतिक चिंताएं भी उठाई जा रही हैं। लेकिन राजनीतिक बहस फिलहाल एक ही सवाल पर अटकी है — क्या यह आत्मनिर्भर भारत का कदम है या कॉरपोरेट निर्भर भारत की नई शुरुआत?

अब देखना यह है कि ‘शांति’ के नाम पर लाया गया यह बिल देश में ऊर्जा क्रांति लाता है या फिर राजनीतिक तापमान और बढ़ा देता है।

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