छत्तीसगढ़ में सरकारी भर्तियों से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा सामने आया है, जिसमें कुछ अधिकारियों पर फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने के आरोप लगे हैं। बताया जा रहा है कि इस प्रकरण में डिप्टी कलेक्टर से लेकर पशु चिकित्सक जैसे पदों पर कार्यरत लोगों के नाम चर्चा में हैं।
हालांकि शिकायतें दर्ज होने और मामले के सार्वजनिक होने के बाद भी अब तक किसी ठोस कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। यही वजह है कि यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या जांच की प्रक्रिया धीमी है या कहीं प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश तो नहीं हो रही?
यह मामला सिर्फ नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं है। असली चिंता उन वास्तविक दिव्यांग अभ्यर्थियों की है, जिनके अधिकार और अवसर ऐसे मामलों से प्रभावित होते हैं। यदि आरक्षण या विशेष प्रावधानों का दुरुपयोग होता है, तो इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की अनियमितताओं पर समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में अन्य भर्तियों में भी पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
सरकार और संबंधित विभागों से अपेक्षा है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो दोषियों के खिलाफ सेवा नियमों के तहत सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
जनता भी अब जवाबदेही की मांग कर रही है— क्योंकि यह मुद्दा सिर्फ एक भर्ती प्रक्रिया का नहीं, बल्कि व्यवस्था में भरोसे का है।



