पटना:बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले एनडीए (NDA) ने अगड़ा वोट बैंक को साधने के लिए रणनीतिक गोलबंदी शुरू कर दी है। गठबंधन ने अगड़ा वर्ग की चार प्रमुख जातियों — ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ — को एक तिहाई से ज्यादा यानी 36% टिकट (87 सीटें) दिए हैं। यह आंकड़ा पिछले चुनाव से 7 सीट अधिक है।
इस बार भाजपा ने 49, जदयू ने 22, लोजपा ने 10, जबकि आरएलएम और हम ने 2-2 सीटों पर इस वर्ग के प्रत्याशी उतारे हैं। इनमें सबसे अधिक उम्मीदवार राजपूत बिरादरी (37) के हैं। वहीं, भूमिहार जाति से 34, ब्राह्मण से 14, और कायस्थ से 2 प्रत्याशी मैदान में हैं।
क्यों बढ़ी अगड़े वर्ग पर NDA की निर्भरता?
राज्य की आबादी में इन चार जातियों की हिस्सेदारी 11% से भी कम है, लेकिन विधानसभा में इनका प्रभाव काफी बड़ा है। वर्तमान विधानसभा में हर चौथा विधायक अगड़ा वर्ग से है। बीते चुनाव में 64 विधायक इस वर्ग से जीते थे, जिनमें से 41 NDA के थे। इसलिए एनडीए इस वोट बैंक पर अपना प्रभुत्व कायम रखना चाहता है।
कायस्थों को इस बार कम प्रतिनिधित्व:
बीते चुनाव में कायस्थ बिरादरी के तीन विधायक जीते थे, तीनों राजग से थे। मगर इस बार इस बिरादरी को सिर्फ दो टिकट मिले हैं। वहीं, कुर्मी बिरादरी से जदयू और भाजपा ने 14 प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि कुशवाहा बिरादरी को अधिक प्राथमिकता दी गई है। इस समुदाय से जदयू ने 13, भाजपा ने 7, आरएलएम ने 3 और लोजपा ने 1 उम्मीदवार को टिकट दिया है।
राजपूत और भूमिहारों को ज्यादा तवज्जो क्यों?
राज्य में राजपूतों की आबादी 3.45% और भूमिहारों की 2.86% है, लेकिन इनका प्रभाव करीब 80 सीटों पर माना जाता है।
बीते चुनाव में भाजपा के 21 में से 15 राजपूत और 14 में से 8 भूमिहार उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी।
जदयू के 7 में से 2 राजपूत और 9 में से 5 भूमिहार प्रत्याशी विजयी रहे।
हालांकि, ब्राह्मण उम्मीदवारों को उतनी सफलता नहीं मिली थी — भाजपा के 11 में से 5 और जदयू के 5 में से सिर्फ 2 ही जीत पाए थे।
राजनीतिक संदेश साफ:
एनडीए की यह टिकट रणनीति स्पष्ट करती है कि गठबंधन अगड़े वर्ग में अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है। राजपूत और भूमिहार वोटरों को साधना चुनावी समीकरण में निर्णायक साबित हो सकता है।







