AICC टीम में हारे हुए पूर्व मंत्रियों की वापसी; युवा और ज़मीनी कार्यकर्ता हाशिए पर, बढ़ रहा मोहभंग। क्या 80 के दशक के मॉडल पर 25 साल का युवा राज्य जीत पाएगी कांग्रेस?
संगठन पर सवालिया निशान: हारे हुए चेहरे ‘पर्यवेक्षक’ कैसे?
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में करारी हार के बावजूद, प्रदेश कांग्रेस के संगठन में आत्ममंथन और जवाबदेही का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं दिख रहा है। पार्टी ने संगठन के विभिन्न पदों और AICC टीम की प्रमुख ज़िम्मेदारियों के लिए फिर से उन्हीं चेहरों पर दाँव लगाया है, जिन्हें हालिया चुनाव में जनता ने सिरे से नकार दिया था।
सख्त सवाल यह है जो नेता अपनी सीट नहीं बचा पाए और जनता में अस्वीकृत हो चुके हैं, वे भला किस आधार पर संगठन को मज़बूत करने या ज़मीनी फीडबैक देने का काम कर सकते हैं?
- जनता का संदेश अनदेखा: यह निर्णय न केवल चुनावी नतीजों में स्पष्ट हुए जनता के संदेश का अपमान है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि हाईकमान अब भी पुरानी गुटबाजी और वफादारी को योग्यता (Merit) से ऊपर मानता है।
- कार्यकर्ता की निष्ठा का अनादर: इस ‘रोटेशन’ व्यवस्था से युवा और ज़मीनी कार्यकर्ता गहरे सदमे और हताशा में हैं। उन्हें लगता है कि उनकी सालों की निष्ठा और मेहनत का कोई मोल नहीं है, क्योंकि पद केवल हार चुके ‘पुराने दरबारियों’ के लिए ही आरक्षित हैं।
पीढ़ीगत बदलाव (Generational Shift) की अनदेखी
कांग्रेस नेतृत्व आज भी 80-90 के दशक के राजनीतिक मॉडल पर चल रहा है, जबकि छत्तीसगढ़ एक युवा राज्य है जिसकी आधी से ज़्यादा आबादी 25 से 40 वर्ष के बीच है। यह पीढ़ी नई सोच, डिजिटल संवाद और तेज़ विकास की माँग करती है।
- नया नेतृत्व क्यों नहीं?: पार्टी में नया और ज़मीनी नेतृत्व तैयार करने की प्रक्रिया पूरी तरह से रुक गई है। पुराने नेता अपने गुट और समर्थकों को ही आगे बढ़ाने में व्यस्त हैं, जिससे संगठन के अंदर गतिरोध पैदा हो गया है।
- मोहभंग की आहट: अगर यही प्रवृत्ति जारी रही, तो युवा और ऊर्जावान कार्यकर्ता या तो निष्क्रिय हो जाएँगे या फिर वे विकल्प की तलाश में दूसरी पार्टियों का रुख करेंगे। यह कांग्रेस के भविष्य को गंभीर रूप से खतरे में डाल सकता है।
सवाल: कांग्रेस कब सुध लेगी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस को भविष्य में राज्य की राजनीति में मज़बूत विपक्ष या सत्ता के दावेदार के रूप में खड़ा होना है, तो उसे कठोर सर्जरी की ज़रूरत है।
पार्टी नेतृत्व को यह समझना होगा कि हार के बाद आत्ममंथन और नए चेहरों को अवसर देना संगठन की पहली ज़रूरत है, न कि हारे हुए नेताओं को पुरस्कृत कर कार्यकर्ताओं के विश्वास को तोड़ना।
यदि यही हाल रहा, तो इन्हीं ‘नकारे गए’ नेताओं के भरोसे छत्तीसगढ़ कांग्रेस कभी मज़बूत नहीं हो पाएगी, और आने वाले चुनावों में पार्टी को और बड़े नुकसान के लिए तैयार रहना होगा।







