“सनातन पर सियासत: कांवड़ यात्रा को लेकर कांग्रेस क्यों बैचेन?”

Madhya Bharat Desk
4 Min Read

उत्तर प्रदेश समेत देशभर में शिवभक्तों की कांवड़ यात्रा जोरों पर है। पुलिस प्रशासन सेवा भाव में जुटा है — कहीं पैरों पर पेन रिलीफ जेल लगाया जा रहा है, तो कहीं फल और जल वितरण हो रहा है। श्रद्धालुओं पर फूलों की वर्षा कर उनका सम्मान किया जा रहा है। लेकिन इस आस्था के माहौल में सियासत की चिंगारी भी देखी जा रही है।

जहां एक ओर सरकार शिवभक्तों के प्रति सम्मानभाव दिखा रही है, वहीं कांग्रेस और उसके सोशल मीडिया समर्थक गुट एक-दो घटनाओं को आधार बनाकर कांवड़ यात्रा और सनातन पर निशाना साधने में लगे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ वीडियो को लेकर कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत, पवन खेड़ा और सुरेंद्र राजपूत जैसे नेताओं ने तीखे ट्वीट कर कांवड़ियों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। कुछ ने उन्हें ‘आतंकी’ तक कह डाला।

सुप्रिया श्रीनेत का पोस्ट
पवन खेड़ा का पोस्ट

 

सुरेंद्र राजपूत का पोस्ट

हैरानी की बात यह है कि किसी भी विवाद की स्थिति में कानून अपना काम करता है — उपद्रवियों पर कार्रवाई होती है। इसके बावजूद पूरी यात्रा को कठघरे में खड़ा किया जाना कहीं न कहीं राजनीतिक मंशा को दर्शाता है।

रणविजय सिंह का पोस्ट

कथित पत्रकार आशुतोष जैसे कई चेहरे यह सवाल उठा रहे हैं कि भाजपा और संघ परिवार के नेता व उनके परिवारजन कांवड़ यात्रा में क्यों नहीं जाते। पर क्या किसी सरकार ने यह अनिवार्य किया है कि हर नागरिक को कांवड़ लाना होगा? नहीं! यह तो प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत श्रद्धा और परंपरा से जुड़ा विषय है। कई परिवारों में पीढ़ियों से कांवड़ लाने की परंपरा रही है — यह धर्म और संस्कृति का हिस्सा है, न कि कोई सरकारी फरमान।

पत्रकार आशुतोष का पोस्ट

इस विरोध की जड़ें गहरी राजनीति में हैं। वरिष्ठ सामाजिक विश्लेषक प्रो. दिलीप मंडल का कहना है कि कांवड़ यात्रा में अब समाज के सभी वर्ग — खासकर पिछड़े वर्गों — की भागीदारी बढ़ी है। यह एकजुटता उस राजनीति को चोट पहुंचा रही है, जो जातीय विभाजन पर टिकी रही है। कांग्रेस को डर है कि यदि समाज संगठित हुआ और जातियों के बीच की खाई मिटने लगी, तो उसकी वोटबैंक की राजनीति कमजोर हो जाएगी।

प्रो. दिलीप मंडल का पोस्ट

यही कारण है कि पहले महाकुंभ को बदनाम किया गया और अब कांवड़ यात्रा को। जबकि यह सत्य है कि जैसे-जैसे आर्थिक स्थिति सुधरती है, वैसे-वैसे धार्मिक सहभागिता भी बढ़ती है। अब जब देश के करोड़ों युवा कांवड़ यात्रा में भाग ले रहे हैं, तो यह उनके आत्मबल और सामर्थ्य का प्रतीक है।

कुछ वामपंथी विचारकों ने धर्म को ‘अफीम’ कहा, लेकिन मार्क्स की पूरी बात यह भी थी कि धर्म जनता के दर्द और प्रतिशोध की अभिव्यक्ति भी है। लेकिन ‘इको-सिस्टम’ को इससे कोई मतलब नहीं — वह आस्था को तर्क की बजाय तिरस्कार से देखता है।

संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है। फिर कांवड़ यात्रा और उसमें भाग लेने वालों को निशाना बनाना, उन्हें ‘गुंडा’, ‘अनपढ़’ कहना — क्या यह उस सम्विधान का अपमान नहीं है, जिसकी बात राहुल गांधी बार-बार करते हैं?

आखिर सवाल उठता है — सनातन की इस विराट परंपरा से कांग्रेस और उसके सहयोगी गुट को इतनी दिक्कत क्यों है?

Share on WhatsApp

Share This Article
Leave a Comment