भारतनेट फेज-2 परियोजना का उद्देश्य देश के दूरदराज़ इलाकों तक तेज़ इंटरनेट पहुंचाना था। लेकिन अब यह महत्वाकांक्षी योजना घोटाले के घेरे में है। सरकारी दस्तावेज़ों से सामने आया है कि कैसे एक बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी को बचाने के लिए सरकारी प्रक्रिया को ताक पर रखकर योजनाबद्ध तरीके से एक नई कंपनी को करोड़ों का ठेका सौंपा गया।
टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को भारतनेट के तहत छत्तीसगढ़ में 32 जिलों में ऑप्टिकल फाइबर बिछाने का ठेका मिला था। लेकिन कंपनी तय समय पर काम नहीं कर सकी, जिससे उस पर 12% की पेनल्टी लगाई गई। करीब 28 करोड़ रुपये की राशि वसूली भी जा चुकी थी। लेकिन बाद में उस पेनल्टी को हटा दिया गया और राशि वापस कर दी गई।
इसी बीच मार्च 2019 में गैलेक्सी सेनर्जी प्राइवेट लिमिटेड (GSPL) नामक एक कंपनी बनाई गई। यह कंपनी छह महीने पुरानी थी और इसके बनने के कुछ ही महीनों में टाटा ने इसे 275 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया। इस कंपनी को 10 हजार किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर लाइन बिछाने का ठेका दे दिया गया — वो भी बिना किसी पुराने रिकॉर्ड या अनुभव के।
इससे यह संदेह गहरा होता है कि यह कंपनी टाटा पर लगे जुर्माने से बचने के लिए बनाई गई शेल कंपनी है। करार में भी इसका उल्लेख था कि अगर टाटा को पेनल्टी से बचना है, तो वह इसी माध्यम से भुगतान करेगा।
इस प्रकरण ने सरकारी संस्थाओं की भूमिका और नीति-निर्माण की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ की बात करती है, वहीं दूसरी ओर इसी डिजिटल प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार की परतें खुल रही हैं।



