मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने तमिलनाडु के आगमिक मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर स्पष्ट नियम बताए हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मंदिरों में प्रवेश के लिए देवता के प्रति श्रद्धा की पुष्टि करने वाला घोषणापत्र देना और मंदिर की परंपराओं का पालन करना जरूरी है।
अदालत का निर्णय
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी. मुरुगन की डिवीजन बेंच ने थंगम वेंकटेश बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में 23 अक्टूबर का फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि गैर-हिंदू श्रद्धालुओं को मंदिर के ध्वज स्तंभ यानी कोडीमरम के आगे जाने से पहले यह घोषणा करनी होगी कि वे संबंधित देवता में आस्था रखते हैं और हिंदू धर्म तथा मंदिर के रीति-रिवाजों का पालन करेंगे।
अदालत ने यह भी कहा कि जो गैर-हिंदू अपने धर्म के धार्मिक चिह्न पहने हों और देवता के प्रति श्रद्धा की पुष्टि न करें, उन्हें मंदिर परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। घोषणापत्र का प्रारूप संबंधित मंदिर तय करेगा।
‘मंदिर पर्यटन स्थल नहीं’
अदालत ने स्पष्ट किया कि आगमिक मंदिर केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं; ये विशेष धार्मिक परंपराओं, आगम शास्त्रों और पूजा-विधियों से शासित स्थान हैं। इसलिए वहां प्रवेश और दर्शन के दौरान मंदिर के धार्मिक नियमों का सम्मान अनिवार्य माना गया है।
अदालत ने यह भी बताया कि यह फैसला केवल आगमिक मंदिरों तक सीमित है। यह प्रतिबंध उन गैर-हिंदुओं पर लागू होगा जो आवश्यक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर नहीं करते।
सीएम जोसेफ विजय का उल्लेख
फैसले में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय का उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि ईसाई धर्म के अनुयायी विजय ने सितंबर में मदुरै के मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर में दर्शन से पहले आवश्यक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद उन्हें देवी मीनाक्षी के दर्शन की अनुमति मिली।
अदालत ने साफ किया कि विजय से हिंदू धर्म अपनाने को नहीं कहा गया; उनसे केवल देवता के प्रति श्रद्धा की पुष्टि करवाई गई। अदालत ने इसे समावेशी दृष्टिकोण बताया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह आदेश एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें आगमिक मंदिरों में प्रवेश-नियमों के प्रवर्तन की मांग की गई थी। अदालत ने 2024 के पिछले आदेश को भी ध्यान में रखा, जिसके तहत ध्वज स्तंभ के आगे जाने वाले गैर-हिंदू श्रद्धालुओं से आस्था और मंदिर के रीति-रिवाजों के पालन की घोषणा ली जाती थी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय उन सभी पूजा स्थलों पर समान रूप से लागू नहीं होगा जहां विभिन्न धर्मों के लोग परंपरागत रूप से आते हैं, जैसे शिरडी साईं बाबा मंदिर।






