इस बजट में BJP का दोहरा चरित्र उजागर, वक़्फ़ से मोहब्बत?

Madhya Bharat Desk
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भारतीय जनता पार्टी का बाहरी चेहरा हिंदुत्व का है, जबकि अंदरूनी नीतियों में वक़्फ़ के प्रति मोहब्बत झलकती है।भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान मानता है, धर्म से ऊपर रखता है और राज्य को तटस्थ रहने का निर्देश देता है। लेकिन केंद्र सरकार की हालिया बजट नीति ने इसी मूल भावना पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वक़्फ़ बोर्ड को 3200 करोड़ रुपये का ब्याज-मुक्त ऋण, कुल 3400 करोड़ का आवंटन, UPSC जैसी परीक्षाओं के लिए मुफ्त कोचिंग, और करीब 300 योजनाएं केवल मुस्लिम समुदाय के लिए—ये फैसले सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि संवैधानिक बहस को जन्म देने वाले हैं।

संविधान का अनुच्छेद 27 स्पष्ट रूप से कहता है कि करदाताओं के धन का उपयोग किसी विशेष धर्म के प्रचार या पोषण में नहीं किया जा सकता। ऐसे में सवाल यह है कि जब योजनाएं और बजट धर्म के आधार पर तय हों, तो क्या यह अनुच्छेद 27 की भावना का उल्लंघन नहीं है?

सरकार इसे “अल्पसंख्यक कल्याण” का नाम देती है, लेकिन कल्याण यदि धार्मिक पहचान से जुड़ जाए, तो वह समान अवसर नहीं, बल्कि राज्य प्रायोजित भेदभाव बन जाता है। गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा की कमी किसी एक मजहब तक सीमित नहीं हैं। फिर योजनाओं का दायरा केवल एक समुदाय तक क्यों?

संविधान सभा में सरदार वल्लभभाई पटेल ने चेताया था कि अल्पसंख्यकों को अलग खांचे में देखने से राष्ट्रीय एकता कमजोर होगी। आज वही आशंका सच होती दिख रही है—अलग बजट, अलग योजनाएं और अलग राजनीतिक नजरिया।

एक तीखा सवाल यह भी है कि अगर पैसे से विश्वास खरीदा जा सकता, तो संसद में मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों से सत्तारूढ़ दल के दर्जनों सांसद होते। हकीकत यह है कि धन से न तो भरोसा खरीदा जा सकता है, न ही लोकतंत्र मजबूत होता है।

अब समय आ गया है कि सरकार स्पष्ट करे—क्या योजनाएं जरूरत के आधार पर होंगी, या धर्म के आधार पर? क्योंकि यह बहस केवल बजट की नहीं, संविधान की आत्मा को बचाने की है।

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