रायपुर।प्रदेश के विभिन्न जन आंदोलनों से जुड़े प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों और पर्यावरण संवेदनशील नागरिकों ने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण के निरंतर विनाश पर गहरी चिंता व्यक्त की है। 27 अक्टूबर 2026 को रायपुर के सिविल लाइंस स्थित वृंदावन हॉल में आयोजित बैठक में इन मुद्दों पर एकजुट संघर्ष चलाने का निर्णय लिया गया।
बैठक में सबसे पहले नवा रायपुर के माना-तूता जंगल में फिल्म सिटी निर्माण के नाम पर पेड़ों की कटाई का कड़ा विरोध किया गया। प्रतिभागियों ने कहा कि भारी पुलिस बल के बीच पेड़ काटे जाना पर्यावरण के साथ अन्याय है। इस मुद्दे पर ग्रामीणों और पुलिस के बीच टकराव की खबरें भी सामने आई हैं, जिसके बाद कटाई रोकी गई थी।
हसदेव अरण्य को लेकर आयोजित बैठक में कहा गया कि इस जैव विविधता से भरपूर वन क्षेत्र में कोयला खनन परियोजनाओं से लगातार विनाश हो रहा है। प्रतिभागियों ने आरोप लगाया कि ग्रामसभाओं के विरोध और राज्य विधानसभा के संकल्प के बावजूद खनन की स्वीकृतियां दी जा रही हैं। परसा ईस्ट केंते बासेन के बाद परसा, केंते एक्सटेंशन और तारा कोल ब्लॉक को लेकर चिंता जताई गई।

बैठक में बताया गया कि केंते एक्सटेंशन कोयला ब्लॉक को पर्यावरण मंत्रालय से पर्यावरण स्वीकृति मिल चुकी है और यह परियोजना सरगुजा जिले में लगभग 1,760 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है।
आयोजकों का कहना था कि हसदेव में खनन से मिनीमाता बांगो जलाशय प्रभावित हो रहा है, भूजल संकट बढ़ रहा है और मानव-हाथी संघर्ष के कारण लोगों तथा हाथियों की मौतें हो रही हैं। उन्होंने दावा किया कि चारों खनन परियोजनाओं से लगभग 15 हजार एकड़ जंगल और जमीन प्रभावित हो सकती है।
बैठक में हसदेव के अलावा पेंड्रावन, रायपुर, रायगढ़, तमनार और नंदराज पहाड़ सहित विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे खनन विरोधी आंदोलनों को एक मंच पर लाने का निर्णय लिया गया। सभी ने प्रदेशव्यापी अभियान चलाकर जंगल, नदी, पहाड़ और पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ आदिवासी एवं किसान समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया।
इसी कड़ी में 15 नवंबर 2026 को भगवान बिरसा मुंडा जयंती के अवसर पर रायपुर में विशाल सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। सम्मेलन के बाद प्रदेश के प्रमुख शहरों में जल-जंगल-जमीन, पर्यावरण विनाश तथा आदिवासी-किसानों के दमन के विरोध में संगोष्ठियां आयोजित की जाएंगी।
बैठक में शामिल प्रतिनिधियों ने सरकार से मांग की कि विकास के नाम पर वनों, नदियों और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की अनदेखी न की जाए। उन्होंने कहा कि विकास पर्यावरण और जनता की कीमत पर नहीं होना चाहिए।





