संकट के भंवर में फंसी भाजपा: सत्ता-संगठन के बीच सुलगता असंतोष और सांगठनिक फेरबदल की मजबूरी

Madhya Bharat Desk
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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा छत्तीसगढ़ और झारखंड में हाल ही में किए गए संगठनात्मक बदलावों को भले ही एक नियमित और सहज प्रक्रिया के रूप में पेश करने की लाख कोशिशें की जा रही हों, लेकिन पर्दे के पीछे की कड़वी सच्चाई कुछ और ही बयां करती है। झारखंड से आ रही धधकती खबरें और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का खुलकर सामने आया रोष यह साफ संकेत देता है कि पार्टी इस वक्त एक गहरे और गंभीर राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रही है। पवन साय को छत्तीसगढ़ से हटाकर झारखंड भेजना और कर्मवीर सिंह को नया दायित्व सौंपना किसी सुनियोजित रणनीति का नहीं, बल्कि भगवा खेमे में मचे भारी घमासान, आपसी खींचतान और लाचारी का सीधा परिणाम है।

छत्तीसगढ़ में सरकार बनने के बाद से ही सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक व व्यावहारिक सामंजस्य का अभाव लगातार चर्चा का विषय रहा है। मंत्रियों और संगठन के बीच तालमेल न बैठ पाने के कारण कार्यकर्ताओं में जबरदस्त घुटन और असंतोष पनप रहा है। मैदानी स्तर पर दिन-रात मेहनत करने वाले कार्यकर्ता आज खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं बचा है। सत्ता के अहंकार और संगठन की उपेक्षा के चलते पार्टी के भीतर जो असंतोष की आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी, उसने अब शीर्ष नेतृत्व की नींद उड़ा दी है।

यही वह प्रमुख कारण है जिसके चलते संगठन के स्तर पर बड़े पैमाने पर फैली नाराजगी और लगातार बढ़ते एंटी-इन्कमबेंसी के खतरे को भांपते हुए केंद्रीय नेतृत्व को मजबूरी में यह बड़ा कदम उठाना पड़ा है। कार्यकर्ताओं के बीच लगातार बढ़ रहे रोष को शांत करने और किसी तरह डैमेज कंट्रोल करने के उद्देश्य से ही महामंत्री का चेहरा बदला गया है, ताकि सरकार के खिलाफ पनप रहे जन-आक्रोश और आंतरिक विद्रोह को वक्त रहते थामा जा सके।

हालत झारखंड में भी इससे जुदा नहीं है। वहां भी पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच भारी असंतोष सुलग रहा है। जमीनी कार्यकर्ताओं की लगातार हो रही उपेक्षा और उनकी आवाज को दबाए जाने के कारण पार्टी के भीतर भयंकर नाराजगी है। सत्ता और संगठन के बीच का पारंपरिक तालमेल पूरी तरह तार-तार हो चुका है, जिसके चलते भाजपा की पूरी मशीनरी पटरी से उतरती नजर आ रही है। शीर्ष नेतृत्व और मैदानी कार्यकर्ताओं के बीच की इस चौड़ी होती खाई ने पार्टी की साख को बट्टा लगाया है, और यह संकट अब लाख छिपाने पर भी छिपाए नहीं छिप रहा।

तथ्य यह है कि यदि भाजपा नेतृत्व ने अब भी अपनी कार्यशैली में बुनियादी सुधार नहीं किया और सत्ता व संगठन के बीच के इस असहज असंतोष को दूर नहीं किया, तो यह संगठनात्मक सर्जरी भी पूरी तरह नाकाफी साबित होगी। छत्तीसगढ़ की माटी से लेकर झारखंड की वादियों तक सुलग रही नाराजगी की यह चिंगारी आने वाले दिनों में पार्टी के लिए और भी बड़ा राजनीतिक संकट पैदा कर सकती है। समय आ गया है कि पार्टी यह समझे कि सिर्फ चेहरे बदलने या मोहरे आगे-पीछे करने से जमीनी जख्म नहीं भरते; इसके लिए नेतृत्व को अपनी प्राथमिकताओं में आमूल-चूल बदलाव करना ही होगा।

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