छत्तीसगढ़ के उत्तर में फैला हसदेव अरण्य सिर्फ पेड़ों और पहाड़ियों का इलाका नहीं है, बल्कि यह मध्य भारत का पारिस्थितिकीय हृदय और लाखों आदिवासियों की आजीविका का मुख्य आधार है। लेकिन जिस तरह से इस संवेदनशील क्षेत्र में अंधाधुंध कोयला खनन को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसने देश के सबसे समृद्ध जंगलों में से एक को गहरी खाइयों और जहरीले पानी में बदल दिया है। यहाँ चल रही खनन गतिविधियाँ न केवल स्थानीय पर्यावरण को तबाह कर रही हैं, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र के अस्तित्व को ही संकट में डाल रही हैं।
अटेम नदी में घुलता जहर
रिपोर्ट्स और शिकायतों के अनुसार, कोयला खनन के बाद उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट—विशेषकर कोल वॉशरी का गंदा और केमिकल युक्त पानी—को बिना किसी प्रभावी ट्रीटमेंट प्लांट (ETP) के सीधे साल्ही नाले में छोड़ा जा रहा है। यह नाला आगे जाकर हसदेव की प्रमुख सहायक नदी अटेम में मिलता है। इस जहरीले पानी के मिलने से नदी का प्राकृतिक जल पूरी तरह दूषित और काला हो चुका है। इसके परिणामस्वरूप, नदी के जलीय जीव तेजी से समाप्त हो रहे हैं और इस पानी पर निर्भर रहने वाले मवेशियों तथा स्थानीय ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है।
NGT के नियमों और पर्यावरण संरक्षण का सरेआम उल्लंघन
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के बेहद कड़े निर्देश और पर्यावरण संरक्षण के नियम यह स्पष्ट कहते हैं कि किसी भी औद्योगिक इकाई या कोल वॉशरी का दूषित पानी प्राकृतिक जल स्रोतों में नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसके बावजूद, खनन कंपनियों द्वारा NGT के इन नियमों की धज्जियां खुलेआम उड़ाई जा रही हैं। विडंबना यह है कि छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड जैसी नियामक संस्थाओं की भूमिका भी इस मामले में संदेहास्पद बनी हुई है, जहाँ स्पष्ट सबूतों और शिकायतों के बाद भी धरातल पर ठोस और कड़ी कार्रवाई का अभाव साफ नजर आता है।
प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण का सवाल
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा कोयला मंत्रालय की ओर से लगातार नई खदानों की स्वीकृतियां दी जा रही हैं। स्थानीय ग्राम सभाओं के कड़े विरोध, जंगली हाथी कोरिडोर के विनाश की चेतावनियों और गंभीर जल संकट की आहट को पूरी तरह दरकिनार किया जा रहा है। कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुँचाने के लिए पर्यावरण से जुड़े कानूनों और सुरक्षा मानकों को मोड़ा जा रहा है, जिससे सरकारी तंत्र की मंशा पर बड़े सवाल खड़े होते हैं।






