रायपुर।छत्तीसगढ़ में बढ़ती चाकूबाजी और नशे के कारोबार को लेकर अब कानून-व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि सरकार भले ही प्रदेश में अपराध बढ़ने की बात को स्वीकार करने से बच रही हो, लेकिन लगातार सामने आ रही चाकूबाजी की घटनाएं अलग तस्वीर पेश कर रही हैं।
शहरों से लेकर कस्बों और मोहल्लों तक छोटी-छोटी बातों पर विवाद के बाद चाकू चलने की घटनाएं सामने आ रही हैं। कई मामलों में नशे की हालत में युवाओं द्वारा हिंसा किए जाने की बात भी सामने आती है। चाकूबाजी की वजह से होने वाली मौतें और गंभीर चोटों के मामले चिंता बढ़ा रहे हैं।
नशे के साथ हथियारों की आसान उपलब्धता पर सवाल
बढ़ते अपराधों के पीछे नशे और हथियारों की आसान उपलब्धता को एक बड़ी वजह माना जा रहा है। आरोप है कि कई इलाकों में नशीले पदार्थों की खुलेआम बिक्री हो रही है और पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए नशे के कारोबार में महिलाओं और नाबालिगों का इस्तेमाल किया जाता है।
ऐसे में सवाल यह है कि युवाओं तक चाकू और दूसरे धारदार हथियार आखिर कैसे पहुंच रहे हैं? क्या हथियार बेचने या उपलब्ध कराने वाले लोगों तक पुलिस की जांच पहुंच रही है?
वारदात के बाद नहीं, पहले हो कार्रवाई
चाकूबाजी पर नियंत्रण के लिए पुलिस को केवल घटना के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित रहने के बजाय अपराध की आशंका को पहले ही खत्म करने की रणनीति पर काम करना होगा।
रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, होटल, बाजार और अन्य भीड़भाड़ वाले इलाकों में औचक चेकिंग की व्यवस्था की जा सकती है। आदतन अपराधियों और संदिग्ध गतिविधियों में शामिल लोगों की लगातार निगरानी के साथ यह भी जांच जरूरी है कि युवाओं तक चाकू और अन्य हथियार किस माध्यम से पहुंच रहे हैं।
इसके साथ ही नशे के कारोबार के खिलाफ नियमित और प्रभावी अभियान चलाने, संवेदनशील इलाकों में औचक निरीक्षण करने और नशे के नेटवर्क की कड़ियों तक पहुंचने की जरूरत है।
चाकूबाजी और नशे की समस्या को नजरअंदाज करने के बजाय यदि पुलिस और प्रशासन अपराध से पहले उसकी जड़ पर कार्रवाई करें, तभी प्रदेश में कानून-व्यवस्था को लेकर आम लोगों का भरोसा मजबूत किया जा सकता है।






