गर्भवती की सोनोग्राफी रिपोर्ट में बड़ा विरोधाभास, कौन जिम्मेदार?

Madhya Bharat Desk
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रायपुर।संतोषी नगर स्थित साईं एडवांस इमेजिंग एंड डायग्नोस्टिक सेंटर की एक सोनोग्राफी रिपोर्ट को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। परिजनों का आरोप है कि 8 माह की गर्भवती महिला की जांच में ऐसी रिपोर्ट दी गई, जिसमें गर्भस्थ शिशु की स्थिति को लेकर गंभीर आशंका जताई गई थी। बाद में दूसरी डायग्नोस्टिक सेंटर में कराई गई जांच में रिपोर्ट सामान्य बताई गई।

परिजनों के अनुसार, 27 सितंबर 2026 को कराई गई पहली जांच की रिपोर्ट में Middle Cerebral Artery (MCA) का diastolic flow increased तथा Cerebroplacental Ratio 3.374 (99 Percentile) जैसी बातें दर्ज थीं। रिपोर्ट लेकर जब परिजन डॉक्टर के पास पहुंचे तो रिपोर्ट के आधार पर गर्भ में बच्चे को रखने अथवा तत्काल डिलीवरी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय को लेकर चिंता की स्थिति पैदा हो गई।

दूसरी जांच में सामने आई सामान्य रिपोर्ट
गंभीर रिपोर्ट मिलने के बाद परिवार ने एहतियात के तौर पर दूसरी जगह जांच कराने का निर्णय लिया। इसके बाद सुंदर नगर स्थित SRS Diagnostics में दोबारा सोनोग्राफी कराई गई। परिजनों का कहना है कि दूसरी जांच में स्थिति सामान्य बताई गई और पहली रिपोर्ट से अलग निष्कर्ष सामने आया।

इस विरोधाभास ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि पहली रिपोर्ट में गंभीर स्थिति बताई गई थी तो दूसरी जांच में रिपोर्ट सामान्य कैसे आई? ऐसे मामलों में गर्भवती महिला और उसके परिजनों के लिए सही और विश्वसनीय चिकित्सकीय रिपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण होती है।

परिजनों ने स्वास्थ्य विभाग से मांगी जांच
परिजनों ने स्वास्थ्य विभाग से पूरे मामले का तत्काल संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराने और जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि दोनों रिपोर्टों के बीच अंतर की विशेषज्ञ चिकित्सकों से जांच कराई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में किसी प्रकार की लापरवाही, तकनीकी त्रुटि या गलत रिपोर्टिंग हुई है या नहीं।

परिजनों का यह भी कहना है कि यदि किसी मरीज को एक रिपोर्ट के आधार पर गंभीर चिकित्सकीय निर्णय लेने की स्थिति में पहुंचा दिया जाता है और बाद की जांच में स्थिति सामान्य निकलती है, तो मामले की गंभीरता से जांच जरूरी है।

विशेषज्ञ जांच से सामने आ सकता है सच
परिजनों ने मांग की है कि दोनों सोनोग्राफी रिपोर्टों की तुलना विशेषज्ञ चिकित्सकों से कराई जाए। साथ ही संबंधित डायग्नोस्टिक सेंटर की जांच प्रक्रिया, मशीनों की गुणवत्ता, रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया तथा तकनीकी स्टाफ की भूमिका की भी जांच की जाए।

यह मामला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है। परिजनों का कहना है कि यदि जांच में किसी प्रकार की लापरवाही या गलत रिपोर्टिंग प्रमाणित होती है, तो संबंधित संस्थान के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी अन्य मरीज को ऐसी स्थिति का सामना न करना

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