खदानों से करोड़ों की रॉयल्टी, फिर भी तिरपाल के नीचे पढ़ रहे आदिवासी बच्चे!

Madhya Bharat Desk
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बस्तर की आज की यह खबर उनके लिए है, जिन्हें लगता है कि खदान खोलने से आदिवासियों का विकास होता है। राज्य सरकारों को इस पर गंभीर अध्ययन कराना चाहिए कि पिछले 50-60 सालों में खदानों के कारण आदिवासी इलाकों पर क्या प्रभाव पड़ा है और वहां रहने वाले आदिवासियों की जिंदगी वास्तव में कितनी बदली है।

दुर्गकोंदल क्षेत्र की तस्वीर इस विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। हाहालद्दी लौह अयस्क माइंस से सरकार को हर साल करोड़ों रुपये की रॉयल्टी मिलती है, लेकिन उसी खनन प्रभावित इलाके के आदिवासी बच्चों को सुरक्षित स्कूल भवन तक नसीब नहीं है। जर्जर और कंडम स्कूल भवन कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं।

बताया जा रहा है कि नए स्कूल भवनों के लिए विभाग की ओर से पांच बार प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं, लेकिन अब तक फंड नहीं मिला। हालात इतने खराब हैं कि बच्चों को मलबे और जर्जर भवन में पढ़ाने के बजाय ग्रामीणों ने खुद आगे आकर श्रमदान किया, चंदा जुटाया और झोपड़ी खड़ी कर बच्चों की पढ़ाई शुरू कराई।

एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए बजट में 22,466 करोड़ रुपये का प्रावधान कर रही है, वहीं दूसरी तरफ माइंस प्रभावित गांवों में बच्चों की शिक्षा तिरपाल और अस्थायी झोपड़ियों के भरोसे चल रही है। इससे सवाल उठता है कि बजट का लाभ आखिर उन इलाकों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा, जहां से सरकार को खनिज संपदा के रूप में लगातार राजस्व मिल रहा है?

खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए जिला खनिज न्यास (DMF) की व्यवस्था भी है। इसके तहत प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता दिए जाने का प्रावधान है। ऐसे में हाहालद्दी क्षेत्र के स्कूलों की बदहाल स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि खनन से मिलने वाले राजस्व और प्रभावित गांवों की वास्तविक जरूरतों के बीच इतनी बड़ी दूरी क्यों है?

हाहालद्दी के स्कूलों की तस्वीर सिर्फ एक जर्जर भवन की कहानी नहीं है। यह उस विकास मॉडल पर सवाल है, जिसमें जमीन के नीचे का लौह अयस्क सरकार के लिए करोड़ों की रॉयल्टी पैदा करता है, लेकिन उसी जमीन के ऊपर रहने वाले आदिवासी बच्चों के लिए एक सुरक्षित छत तक उपलब्ध नहीं हो पाती।

जरूरत अब सिर्फ नए स्कूल भवन की नहीं, बल्कि इस बात के जवाब की भी है कि दशकों से खनन के बावजूद आदिवासी इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति कितनी बदली। आखिर खदानों से निकलने वाली दौलत का कितना हिस्सा उन गांवों तक पहुंचा, जिनकी जमीन और संसाधनों से यह राजस्व पैदा हो रहा है?

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