मध्यप्रदेश को देश का ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है। बाघों की बढ़ती संख्या प्रदेश के लिए गर्व की बात है, लेकिन इसी के साथ बाघों की मौतों का बढ़ता आंकड़ा अब चिंता का कारण बन गया है। साल 2026 के शुरुआती आठ महीनों में ही 45 बाघों की मौत हो चुकी है।
एक तरफ छठी राष्ट्रीय बाघ गणना-2026 चल रही है और प्रदेश में बाघों की संख्या 1,000 से 1,100 के पार पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ लगातार हो रही मौतें संरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही हैं।
2022 में 785 बाघ, अब 1,000 पार होने का अनुमान
पिछली आधिकारिक राष्ट्रीय बाघ गणना 2022 में मध्यप्रदेश में 785 बाघ पाए गए थे। इस आंकड़े के साथ मध्यप्रदेश देश में सबसे ज्यादा बाघों वाला राज्य बना था।
अब नई गणना के शुरुआती अनुमानों में प्रदेश में बाघों की संख्या 1,000 से 1,100 के पार पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है। यानी बाघों का कुनबा बढ़ा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रदेश के जंगल इतनी बड़ी आबादी को सुरक्षित तरीके से संभालने के लिए तैयार हैं?
आठ महीने में 45 मौतें, क्या है वजह?
2026 में जनवरी से मई के बीच 28 बाघों की मौत दर्ज की गई थी। 28 जुलाई तक यह आंकड़ा 40 पहुंच गया और अब अगस्त में कुल मौतें 45 हो चुकी हैं।
पिछले वर्षों के आंकड़े भी तस्वीर को गंभीर बनाते हैं—
- 2021 – 42 मौतें
- 2022 – 34 मौतें
- 2023 – 45 मौतें
- 2024 – 34 मौतें
- 2025 – 55 मौतें
- 2026 – अगस्त तक 45 मौतें
पिछले पांच वर्षों में 210 बाघों की मौत दर्ज हुई। 2026 की 45 मौतों को जोड़ने पर यह आंकड़ा 255 तक पहुंच जाता है।
आपसी संघर्ष भी बना बड़ी वजह
बाघों की मौत के पीछे केवल शिकार ही जिम्मेदार नहीं है। आपसी संघर्ष, टेरिटोरियल फाइट, बीमारी, करंट और शिकार जैसे कई कारण सामने आए हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक जंगल और बाघों के प्राकृतिक आवास पर बढ़ते दबाव के कारण बाघों के बीच क्षेत्र और भोजन को लेकर संघर्ष बढ़ रहा है।
वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट अजय शंकर दुबे का कहना है कि बाघों के लिए जंगल कम पड़ रहा है। जंगलों में अतिक्रमण के कारण उनका प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहा है और बाघ रहवासी इलाकों में पहुंच रहे हैं। इससे मानव-बाघ संघर्ष के साथ-साथ बाघों के आपसी संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।
बाघ बढ़े तो इंसानों के लिए भी बढ़ा खतरा
बाघों की बढ़ती संख्या के साथ मानव-बाघ संघर्ष भी बड़ी चुनौती बन गया है। वन विभाग की जानकारी के अनुसार इस वर्ष हुई मानव मौतों में 22 लोगों की मौत बाघों के हमले में हुई है।
जब बाघ जंगल से निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचते हैं तो इंसानों के साथ टकराव की स्थिति बनती है। ऐसे मामलों में कई बार इंसानों के साथ-साथ बाघों की जान भी जाती है।
करोड़ों का बजट, फिर भी संरक्षण पर सवाल
राज्य सरकार ने वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण के लिए ₹6,151 करोड़ का प्रावधान किया है। वहीं प्रोजेक्ट टाइगर के तहत केंद्र सरकार का देशभर के टाइगर रिजर्व के लिए लगभग ₹290 करोड़ का बजट बताया गया है।
मध्यप्रदेश में नौ टाइगर रिजर्व होने के कारण केंद्र की राशि में प्रदेश की हिस्सेदारी भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने बड़े बजट और संसाधनों के बावजूद बाघों की मौतों को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर क्या कमियां रह जा रही हैं?
हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला
बाघों की मौतों का मामला जबलपुर हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका के दौरान भी सामने आया है। सुनवाई के दौरान सरकार और वन विभाग की ओर से बाघों की मौत से जुड़े आंकड़े अदालत के सामने रखे गए।
सरकार का कहना है कि अधिकांश मौतें शिकार के बजाय आपसी संघर्ष और प्राकृतिक कारणों से हुई हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि शिकार, जंगलों पर बढ़ता अतिक्रमण और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में कमी जैसे मुद्दों पर भी गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
असली चुनौती सिर्फ संख्या बढ़ाना नहीं
मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या 1,000 के पार पहुंचना निश्चित तौर पर बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन टाइगर स्टेट की असली सफलता सिर्फ गणना में बाघों की संख्या बढ़ने से नहीं होगी।
जरूरी है कि बाघों के लिए पर्याप्त जंगल, सुरक्षित कॉरिडोर, पर्याप्त शिकार-आधार, अवैध शिकार पर प्रभावी कार्रवाई और स्थानीय लोगों के साथ बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मध्यप्रदेश में कितने बाघ हैं?
बड़ा सवाल यह है कि इन बाघों को सुरक्षित रखने के लिए हमारे जंगल और हमारी व्यवस्था कितनी तैयार है?





