भिलाई।देश के प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के इस्पात संयंत्रों में शामिल भिलाई स्टील प्लांट (BSP) में भारी इस्पात कबाड़ की चोरी और कथित भ्रष्टाचार का मामला अब एक बड़े संगठित रैकेट के रूप में सामने आने का दावा किया जा रहा है। शुरुआती तौर पर मामूली चोरी समझे गए इस मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ इसमें प्लांट के अधिकारियों, निजी ठेकेदारों, कबाड़ कारोबारियों और राजनीतिक संरक्षण से जुड़े गंभीर आरोप सामने आए हैं। मामले ने भिलाई से लेकर पूरे औद्योगिक क्षेत्र तक हलचल पैदा कर दी है।
जांच से जुड़े दावों के मुताबिक, प्लांट से निकलने वाले कबाड़ की चोरी सुनियोजित तरीके से की जाती थी। आरोप है कि चोरी किए गए कबाड़ का एक बड़ा हिस्सा बिना रिकॉर्ड और बिना बिल के बाजार में खपाया जाता था। इसी के चलते सरकारी राजस्व को भी भारी नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई है। मामले में GST चोरी की संभावना की भी जांच किए जाने की बात सामने आई है।
‘बचु’ ने खोले कथित नेटवर्क के राज
जांच में भूषण मुडालियार उर्फ ‘बचु’ का नाम कथित मास्टरमाइंड के तौर पर सामने आया है। उसके बयान के आधार पर जांच एजेंसियों ने चोरी के कबाड़ की खरीद-फरोख्त से जुड़े नेटवर्क की पड़ताल शुरू की। आरोप है कि चोरी के माल को दो निजी फर्मों के माध्यम से बाजार तक पहुंचाया जाता था, जिनका नियंत्रण मोहम्मद सलीम और आकाश सिंह से जुड़ा बताया गया है।
चोरी के कबाड़ को प्लांट परिसर से बाहर निकालना भी इस कथित नेटवर्क का अहम हिस्सा था। आरोप है कि एक भरोसेमंद ट्रांसपोर्टर के जरिए वाहनों और दस्तावेजों से जुड़े ऐसे तरीके अपनाए जाते थे, जिससे सुरक्षा जांच के दौरान चोरी का माल आसानी से बाहर निकल सके।
राजनीतिक संरक्षण के आरोप ने बढ़ाई गंभीरता
मामले में स्थानीय राजनीतिक संरक्षण के आरोपों ने विवाद को और गहरा कर दिया है। आरोप है कि सिंडिकेट की गतिविधियों को निर्बाध रूप से चलाने के लिए एक स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि तक हर महीने कथित ‘प्रोटेक्शन मनी’ पहुंचाई जाती थी। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
BSP के अधिकारियों की गिरफ्तारी से उठे बड़े सवाल
मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जांच के दौरान निजी कारोबारियों और ठेकेदारों के अलावा BSP के वरिष्ठ अधिकारियों और इंजीनियर स्तर के कर्मचारियों पर भी कार्रवाई हुई है। जनरल मैनेजर स्तर के अधिकारी की गिरफ्तारी के दावे ने प्लांट की आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
सवाल यह है कि यदि कबाड़ की चोरी लंबे समय से सुनियोजित तरीके से चल रही थी, तो प्लांट की सुरक्षा, स्टोर, डिस्पैच, स्क्रैप नीलामी और परिवहन व्यवस्था की निगरानी करने वाले तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगी?
निजीकरण और ठेका व्यवस्था भी सवालों के घेरे में
इस पूरे मामले ने BSP में कबाड़ प्रबंधन के लिए अपनाई गई ठेका व्यवस्था पर भी बहस छेड़ दी है। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि निजी ठेकेदारों को जिम्मेदारी सौंपने के दौरान उनके पुराने रिकॉर्ड, अनुभव और विश्वसनीयता की पर्याप्त जांच नहीं की गई।
यूनियनों की मांग है कि कबाड़ से जुड़े सभी पुराने टेंडर, ठेकेदारों की पात्रता, नीलामी प्रक्रिया, परिवहन रिकॉर्ड, गेट पास, वजन पर्चियां और भुगतान का उच्चस्तरीय ऑडिट कराया जाए। साथ ही यह भी जांच हो कि किसी एक फर्म या नेटवर्क को बार-बार ठेके दिए गए या नहीं।
60 फीसदी कबाड़ बिना बिल बेचने के दावे की भी जांच जरूरी
मामले में चोरी किए गए कबाड़ के करीब 60 प्रतिशत हिस्से को कथित तौर पर बिना बिल बेचने का दावा किया जा रहा है। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला केवल चोरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बड़े पैमाने पर कर चोरी और सरकारी राजस्व के नुकसान का भी बन सकता है।
यही कारण है कि जांच का दायरा केवल कबाड़ चोरी तक सीमित रखने के बजाय उससे जुड़े खरीदारों, विक्रेताओं, ट्रांसपोर्टरों, बैंकिंग लेनदेन और कथित अवैध भुगतान तक बढ़ाने की मांग उठ रही है।
‘स्क्रैप’ से सुरक्षा तक—BSP की व्यवस्था पर बड़ा सवाल
भिलाई स्टील प्लांट देश की औद्योगिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे संस्थान में स्क्रैप जैसी संपत्ति की लगातार चोरी की आशंका केवल आर्थिक नुकसान का विषय नहीं है, बल्कि यह आंतरिक नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह कथित नेटवर्क कितना पुराना था, इसमें कितने लोग शामिल थे और चोरी से लेकर बिक्री तक किस स्तर पर किसकी भूमिका रही? साथ ही यह भी सामने आना जरूरी है कि प्लांट को हुए वास्तविक आर्थिक नुकसान का आंकड़ा कितना है।
कर्मचारी संगठनों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल कबाड़ चोरी का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा में संस्थागत विफलता का गंभीर उदाहरण होगा।





