नागेन्द्र पाण्डेय, संपादक
“चुनाव तो आता-जाता रहता है।” सत्ता के गलियारों में यह वाक्य अक्सर तब सुनाई देता है, जब कोई चुनावी नतीजा अपेक्षाओं के विपरीत आता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर चुनाव केवल कैलेंडर की एक तारीख होता है, या फिर वह जनता की नब्ज़ पर दर्ज एक राजनीतिक टिप्पणी भी होता है?
बांकीपुर का जनादेश इसी सवाल को फिर सामने खड़ा करता है। लोकतंत्र में कोई भी चुनाव छोटा नहीं होता। एक विधानसभा सीट भी राजनीतिक दलों की लोकप्रियता, संगठन की मजबूती, नेतृत्व की स्वीकार्यता और जनता के बदलते मूड का संकेत दे सकती है। इसलिए इसे केवल यह कहकर टाल देना कि “चुनाव तो आते-जाते रहते हैं”, राजनीतिक सुविधा तो हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक समझ नहीं।
इतिहास गवाह है कि कई बार छोटे चुनावों ने बड़े राजनीतिक बदलावों की आहट दी है। उपचुनावों और स्थानीय चुनावों ने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदलने वाले संकेत भी दिए हैं। इसलिए समझदार राजनीतिक दल चुनावी हार या जीत का जश्न मनाने से अधिक उसके संदेश को पढ़ने का प्रयास करते हैं।
बिहार में चुनाव में जाति ही जीत की गारंटी रही है. इसी समीकरण को देखकर पार्टियां टिकट भी देती रही हैं, सबको भरोसा हो गया था यह इतनी जल्दी टूटने वाला नहीं है पर बिहार में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी पार्टी ने बिना किसी जाति समीकरण के जीत हासिल कर ली है। यह बिहार पैटर्न अब देश पर भी लागू हो सकता है क्योंकि युवा पीढ़ी अब जातिय से ऊपर उठ चुके है और उनका लक्ष्य अब विकास पर है।
लोकतंत्र में जनता केवल वोट नहीं देती, वह समय-समय पर राजनीतिक दलों को संदेश भी देती है। कभी वह भरोसा जताती है, कभी चेतावनी देती है और कभी बदलाव का संकेत देती है। इन संकेतों को नज़रअंदाज़ करना किसी भी दल के लिए भविष्य में भारी पड़ सकता है।
इसलिए सवाल चुनाव के आने-जाने का नहीं है, बल्कि जनादेश को समझने का है। चुनाव बीत जाते हैं, लेकिन जनता का संदेश राजनीतिक स्मृति में लंबे समय तक दर्ज रहता है। जो दल उस संदेश को सुन लेते हैं, वे आगे बढ़ते हैं; जो उसे अनसुना कर देते हैं, उनके लिए अगला चुनाव अक्सर और कठिन साबित होता है।





