रायपुर।छत्तीसगढ़ सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य को अपनी प्राथमिकता बताती है, लेकिन जमीनी हालात इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। कहीं आठ साल से स्कूल भवन अधूरा पड़ा है, कहीं 318 सरकारी स्कूल बिना शौचालय के संचालित हो रहे हैं, कहीं पहली से पांचवीं तक की छह कक्षाएं एक ही कमरे में लग रही हैं, तो कहीं गणित और विज्ञान जैसे विषय हिंदी के शिक्षक पढ़ाने को मजबूर हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सरकार की प्राथमिकता शिक्षा और स्वास्थ्य हैं या केवल सरकारी आयोजनों और घोषणाओं तक ही सीमित हैं।
8 साल से अधूरा स्कूल भवन, बच्चों को नहीं मिली अतिरिक्त कक्षा
कबीरधाम जिले की ग्राम पंचायत दपका स्थित शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला में वर्ष 2018-19 में अतिरिक्त कक्ष निर्माण के लिए 6.45 लाख रुपये स्वीकृत किए गए थे। निर्माण कार्य शुरू तो हुआ, लेकिन छज्जा स्तर तक पहुंचकर रुक गया। करीब आठ साल बीत जाने के बाद भी भवन अधूरा है। जिस भवन में बच्चों की पढ़ाई होनी थी, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं और दीवारें धीरे-धीरे जर्जर होती जा रही हैं। इस दौरान दो सरपंच बदल गए, लेकिन भवन पूरा नहीं हो सका।

318 स्कूलों में शौचालय नहीं, 65 भवन जर्जर
शाला प्रवेश उत्सव के साथ नए शिक्षा सत्र की शुरुआत तो हो गई, लेकिन कबीरधाम जिले के 1608 सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति चिंताजनक है। बड़ी संख्या में बच्चों को अब तक नई यूनिफॉर्म और पाठ्यपुस्तकें नहीं मिली हैं। सबसे गंभीर स्थिति यह है कि जिले के 318 स्कूलों में शौचालय तक उपलब्ध नहीं हैं, जिससे विशेष रूप से छात्राओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। वहीं 65 स्कूल भवन ऐसे हैं, जिनके गिरने का खतरा बना हुआ है। वनांचल क्षेत्रों के स्कूलों की स्थिति और भी खराब बताई जा रही है।


नियमों के अनुसार 49 विद्यार्थियों तक वाले स्कूलों को 25 हजार रुपये और 50 से अधिक छात्र संख्या वाले स्कूलों को 50 हजार रुपये प्रतिवर्ष रखरखाव के लिए दिए जाते हैं, जिनका उपयोग शौचालय मरम्मत, सफाई और पेयजल व्यवस्था पर किया जाना है। बावजूद इसके जमीनी हालात बदहाल हैं।
नियमितीकरण की मांग पर हड़ताल, हिंदी शिक्षक पढ़ा रहे गणित और विज्ञान
सरगुजा संभाग में अतिथि शिक्षक नियमितीकरण की मांग को लेकर एक जुलाई से शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के निवास के सामने अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठे हैं। हड़ताल के कारण बलरामपुर, सूरजपुर और सरगुजा जिलों के कई स्कूलों में गणित, भौतिकी, रसायन और कॉमर्स जैसे विषयों की पढ़ाई प्रभावित हो गई है। कई जगह इन विषयों को हिंदी के शिक्षक पढ़ा रहे हैं।

अतिथि शिक्षकों का कहना है कि वे पिछले 12 वर्षों से मात्र 20 हजार रुपये के मानदेय पर सेवाएं दे रहे हैं। उनका आरोप है कि जब गजेंद्र यादव विधायक थे, तब उन्होंने नियमितीकरण के समर्थन में अनुशंसा की थी, लेकिन शिक्षा मंत्री बनने के बाद अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई।
एक ही कमरे में बालवाड़ी से पांचवीं तक की छह कक्षाएं
बिलासपुर जिले के तखतपुर ब्लॉक स्थित शासकीय प्राथमिक शाला सरसेनी में पिछले सात वर्षों से पहली से पांचवीं तक की कक्षाएं एक ही कमरे में संचालित हो रही हैं। इस वर्ष उसी कमरे में बालवाड़ी के बच्चों को भी बैठाना पड़ा है। एक ही कमरे में छह अलग-अलग कक्षाओं के 41 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।

स्कूल में केवल प्रधानपाठक निर्मल कौशिक और शिक्षिका पूनम पोर्ते पदस्थ हैं। जर्जर भवन के कारण वर्ष 2019 से पूरी व्यवस्था एक ही कमरे में चल रही है और अब बालवाड़ी जुड़ने से स्थिति और गंभीर हो गई है।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर बड़ा सवाल
सरकारी स्कूलों की यह तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। जिन बच्चों को सुरक्षित भवन, पर्याप्त शिक्षक, शौचालय, किताबें और बेहतर शिक्षा मिलनी चाहिए, वे आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस प्रदेश में हजारों बच्चे अधूरे और जर्जर स्कूलों में पढ़ने को मजबूर हैं, वहां शराब दुकानों के संचालन के लिए पक्के भवन और सभी व्यवस्थाएं आसानी से उपलब्ध करा दी जाती हैं।
यदि शिक्षा और स्वास्थ्य वास्तव में सरकार की प्राथमिकता होते, तो आठ साल तक स्कूल भवन अधूरे नहीं रहते, सैकड़ों स्कूल शौचालय विहीन नहीं होते, बच्चे एक ही कमरे में छह कक्षाओं के साथ पढ़ाई करने को मजबूर नहीं होते और मुख्य विषयों की पढ़ाई योग्य शिक्षकों के अभाव में प्रभावित नहीं होती।
सरकारी दावों और जमीनी सच्चाई के बीच बढ़ती यह दूरी अब केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि प्रदेश के भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुकी है।





