20 जुलाई से शुरू होने जा रहे संसद के मानसून सत्र में केंद्र सरकार कई बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विधेयक पेश करने की तैयारी में है। इनमें डिलिमिटेशन (परिसीमन) विधेयक, महिला आरक्षण लागू करने से जुड़ा संविधान संशोधन और 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहने पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के पद छोड़ने का प्रावधान वाला प्रस्तावित संविधान संशोधन प्रमुख माना जा रहा है।
इन तीनों प्रस्तावों पर सरकार और विपक्ष के बीच जोरदार टकराव के आसार हैं। चूंकि ये संविधान संशोधन से जुड़े विषय हैं, इसलिए इन्हें पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (दो-तिहाई बहुमत) की आवश्यकता होगी।
मौजूदा संख्या बल के अनुसार लोकसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 540 मानी जाए तो किसी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए लगभग 360 सांसदों का समर्थन जरूरी होगा। वर्तमान में NDA के पास करीब 292 सांसद हैं, यानी सरकार अपने दम पर आवश्यक बहुमत से काफी पीछे है। राज्यसभा में भी स्थिति लगभग ऐसी ही है, जहां NDA को विशेष बहुमत के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा।
सबसे अधिक चर्चा उस प्रस्तावित विधेयक की हो रही है जिसमें प्रावधान है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे अपने पद से हटना होगा। सरकार इसे जवाबदेही और स्वच्छ राजनीति की दिशा में कदम बता सकती है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाला कानून बता रहा है।
इसी के साथ सरकार महिला आरक्षण को जल्द लागू करने के लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधन और डिलिमिटेशन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास भी कर सकती है। हालांकि पिछली बार भी इन मुद्दों पर सरकार को आवश्यक विशेष बहुमत नहीं मिल पाया था, इसलिए इस बार भी पूरा राजनीतिक समीकरण सहयोगी दलों और विपक्ष के रुख पर निर्भर करेगा।
ऐसे में 2026 का मानसून सत्र केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि संसद में संख्या बल, राजनीतिक रणनीति और विपक्ष-सरकार की ताकत की सबसे बड़ी परीक्षा भी साबित हो सकता है। पूरे देश की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या सरकार इन महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाएगी या फिर एक बार फिर संसद में संख्या का गणित उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा।







