अबूझमाड़ के घने जंगलों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों का आरोप है कि जंगल की कटाई सरकारी पट्टों, जमीन कब्जे और भविष्य की खनन गतिविधियों के लिए की जा रही है। इस पूरे खेल में जंगल के भीतर और बाहर के लोगों की मिलीभगत की बात सामने आ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव-गांव में लगातार पेड़ काटे जा रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के बजाय सर्वेक्षण प्रक्रिया को आगे कर दिया गया है। आरोप है कि सर्वे के नाम पर कटाई रोकने की कार्रवाई टाल दी गई है, जिससे कटाई करने वालों को खुला समय मिल रहा है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, जंगल कम होने से बड़ी कंपनियों के लिए खनन स्वीकृतियां लेना आसान हो जाएगा। यही वजह है कि पहले पेड़ों की कटाई हो रही है और बाद में वन विभाग द्वारा सेटेलाइट मैपिंग की तैयारी की जा रही है। सवाल यह है कि जब तक सर्वे और मैपिंग पूरी होगी, तब तक क्या जंगल बच पाएंगे?

अबूझमाड़ लगभग 4400 वर्ग किलोमीटर में फैला देश के सबसे घने और संवेदनशील वन क्षेत्रों में से एक है। इसकी सीमा नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा और गढ़चिरौली तक फैली हुई है।
करीब चार दशकों तक यह इलाका नक्सली गतिविधियों का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता रहा। लेकिन अब यहां तेजी से बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक समीकरण नए खतरे पैदा कर रहे हैं।
पर्यावरणविद लंबे समय से अबूझमाड़ को देश का “पर्यावरणीय सुरक्षा कवच” बताते रहे हैं। जिस तरह अमेज़न वर्षावन को दुनिया का फेफड़ा कहा जाता है, उसी तरह अबूझमाड़ के जंगलों को भारत का फेफड़ा माना जाता है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यह कटाई नहीं रुकी, तो इसका असर सिर्फ स्थानीय जैव विविधता पर नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के जलवायु संतुलन, जल स्रोतों और आदिवासी जीवन पर पड़ेगा।





