जगदलपुर: छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक जगत के लिए एक बेहद गौरवपूर्ण और ऐतिहासिक खबर है। बस्तर की अनूठी संगीत परंपराओं को सहेजने और उन्हें वैश्विक मंच पर स्थापित करने वाले प्रख्यात रंगकर्मी व ‘बस्तर बैंड’ के संयोजक अनूप रंजन पांडेय को प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया है।
बरसों से रंगमंच और लोक कलाओं के संरक्षण में सक्रिय अनूप रंजन पांडेय को यह सम्मान उनके अद्वितीय योगदान के लिए दिया जा रहा है।
बस्तर बैंड: विलुप्त होती धुनों को मिला नया जीवन
अनूप रंजन पांडेय का नाम आते ही सबसे पहले जेहन में ‘बस्तर बैंड’ की गूंज सुनाई देती है। उन्होंने बस्तर के दूरदराज के आदिवासी अंचलों से दुर्लभ और विलुप्त हो रहे वाद्ययंत्रों को इकट्ठा किया और उनके वादकों को एक मंच पर लाए।
- परंपरा का संरक्षण: इस बैंड के जरिए उन्होंने बस्तर की विभिन्न जनजातियों के पारंपरिक संगीत, लोकगीतों और नृत्य शैलियों को न सिर्फ जीवित रखा, बल्कि देश-विदेश के बड़े मंचों तक पहुँचाया।
- अनूठे वाद्ययंत्र: धनकुल, मुयांग, तोड़ी और सुलूर जैसे बस्तर के पारंपरिक वाद्ययंत्रों की तान आज अगर दुनिया सुन रही है, तो इसमें अनूप जी की बरसों की साधना का बड़ा हाथ है।
रंगमंच और कला साधना का लंबा सफर
अनूप रंजन पांडेय पिछले कई दशकों से रंगमंच और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। उन्होंने नाटक निर्देशन, पटकथा लेखन और लोक संगीत के फ्यूजन पर अभूतपूर्व काम किया है। उनका मानना रहा है कि बस्तर का संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि वहाँ की जीवनशैली, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव का माध्यम है।
“यह पुरस्कार सिर्फ मेरा नहीं, बल्कि बस्तर के उन तमाम गुमनाम लोक कलाकारों, बुजुर्गों और माटी के संगीत का सम्मान है, जिन्होंने सदियों से इस अनमोल विरासत को सीने से लगाकर रखा है।”
— अनूप रंजन पांडेय (पुरस्कार की घोषणा के बाद)
छत्तीसगढ़ में खुशी की लहर
इस प्रतिष्ठित पुरस्कार की घोषणा के बाद से ही छत्तीसगढ़ के कला जगत, रंगकर्मियों और साहित्यकारों में खुशी की लहर है। मुख्यमंत्री समेत प्रदेश के वरिष्ठ राजनेताओं और संस्कृति प्रेमियों ने अनूप रंजन पांडेय को बधाई दी है। लोगों का कहना है कि इस पुरस्कार से बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को एक नया आयाम मिलेगा और युवा पीढ़ी अपनी जड़ों की ओर आकर्षित होगी।





