सुशासन या सुरा-शासन? स्कूलों पर ताले और 67 नई शराब दुकानों के साथ कैसा अमृत काल?

Madhya Bharat Desk
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रायपुर। छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार द्वारा घोषित वर्ष 2025-26 की नई आबकारी नीति ने राज्य में एक नई राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है। एक ओर सरकार इसे राजस्व वृद्धि और अवैध शराब पर अंकुश लगाने का माध्यम बता रही है, वहीं विपक्ष और सामाजिक विशेषज्ञ इसे ‘नशे का विस्तार’ करार दे रहे हैं।

नीति के मुख्य बिंदु:

  • दुकानों में विस्तार: प्रदेश में 67 नई शराब दुकानें खोलने की मंजूरी दी गई है, जिससे कुल दुकानों की संख्या 741 हो जाएगी।
  • कीमतों में कटौती: 1 अप्रैल 2025 से शराब की कीमतों में लगभग 4% की कमी की जाएगी।
  • पैकिंग में बदलाव: काँच की बोतलों की जगह अब प्लास्टिक (PET) बोतलों में भी शराब उपलब्ध कराने की तैयारी है।
  • राजस्व लक्ष्य: अगले वित्तीय वर्ष में सरकार ने शराब से ₹12,500 करोड़ के राजस्व का लक्ष्य रखा है।

विपक्ष का तीखा हमला: “महतारी वंदन का पैसा बोतल में”

कांग्रेस ने इस नीति को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया है। पूर्ववर्ती सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि:

  • चुनावी वादाखिलाफी: चुनाव से पहले शराबबंदी का मुद्दा उठाने वाली भाजपा अब घर-घर शराब पहुँचा रही है।
  • दोहरा मापदंड: एक हाथ से ‘महतारी वंदन योजना’ के जरिए महिलाओं को सहायता दी जा रही है और दूसरे हाथ से सस्ती शराब देकर उनके परिवारों को बर्बाद किया जा रहा है।
  • शिक्षा बनाम नशा: जहाँ हज़ारों सरकारी स्कूलों को मर्ज (विलय) किया जा रहा है, वहीं नई शराब दुकानें खोलना सरकार की प्राथमिकता पर गंभीर सवाल उठाता है।

सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकार

विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की आसान उपलब्धता से घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में, जहाँ स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही सीमित हैं, शराब का बढ़ता जाल सामाजिक ढांचे को कमजोर कर सकता है। साथ ही, प्लास्टिक बोतलों के उपयोग से पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर भी चिंता जताई जा रही है।

सत्ता का तर्क

सरकार का पक्ष है कि ‘ड्राई ज़ोन’ (जहाँ 30 किमी तक कोई दुकान नहीं है) को खत्म करने से अवैध और ज़हरीली शराब की बिक्री पर रोक लगेगी। प्रशासनिक सुधारों के जरिए राजस्व को सुव्यवस्थित करना ही इस नीति का मूल उद्देश्य है।

छत्तीसगढ़ में अब “शिक्षा की किताब या शराब की बोतल” की बहस तेज़ हो गई है। राजस्व की चमक और सामाजिक सेहत के बीच का यह संतुलन आने वाले समय में साय सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

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