16 जून से छत्तीसगढ़ में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने जा रहा है, लेकिन स्कूल खुलने से पहले ही शिक्षा व्यवस्था की हकीकत सरकार के दावों की पोल खोल रही है। एक ओर शिक्षा में सुधार, गुणवत्ता और नवाचार की बातें की जा रही हैं, दूसरी ओर प्रदेश में 43 हजार से अधिक शिक्षकीय पद खाली पड़े हैं। अब पाठ्यपुस्तकों का संकट भी सामने आ गया है। कई सरकारी स्कूलों में किताबें नहीं पहुंची हैं, जबकि कुछ जगह पुराने छात्रों की किताबें नए प्रवेश लेने वाले बच्चों को देने की नौबत आ गई है। निजी स्कूलों के हजारों छात्र तो अब भी पुस्तकों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
यह सिर्फ प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलता है। जब नए सत्र की तारीख पहले से तय थी, तब पाठ्यपुस्तकों की छपाई, आपूर्ति और वितरण की तैयारी समय पर क्यों नहीं हुई? यदि सरकार को मुद्रण या लॉजिस्टिक्स की समस्या का अंदेशा था, तो वैकल्पिक व्यवस्था पहले से क्यों नहीं बनाई गई?
स्थिति और भी चिंताजनक इसलिए है क्योंकि प्रदेश के हजारों स्कूल पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। 43 हजार खाली पद केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर लगा प्रश्नचिह्न हैं। जब एक शिक्षक को कई कक्षाओं और दर्जनों छात्रों की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, तब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करना केवल भाषण बनकर रह जाता है।

स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे गजेंद्र यादव से अब जवाब अपेक्षित है। आखिर योजना बनाने में चूक किसकी हुई? पुस्तक वितरण की जिम्मेदारी किसने निभाई और किसने नहीं? बच्चों की पढ़ाई शुरू होने से पहले किताबें और शिक्षक उपलब्ध कराना क्या सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं है?
सरकार को तत्काल आपातकालीन कदम उठाने होंगे। जहां किताबें नहीं पहुंची हैं वहां डिजिटल सामग्री, प्रिंटेड हैंडआउट और स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। साथ ही शिक्षकों के खाली पदों को भरने के लिए भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाई जाए और अंतरिम व्यवस्था के तहत आवश्यक नियुक्तियां की जाएं।
शिक्षा किसी सरकार की उपलब्धियों का सबसे बड़ा पैमाना होती है। यदि स्कूल खुल जाएं, लेकिन न शिक्षक हों और न किताबें, तो शिक्षा सुधार के दावे खोखले साबित होते हैं। बच्चों का भविष्य किसी फाइल, टेंडर या प्रशासनिक बहाने का इंतजार नहीं कर सकता।
— नागेंद्र पांडेय, MBP





