मध्यप्रदेश के सतना जिले के बिरसिंहपुर मांजन से सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर करारा तमाचा लगा है। किसान दीपक द्विवेदी की 3 एकड़ जमीन पर लहलहाई गेहूं की फसल को खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने सरकारी रिकॉर्ड में महज 0.387 हेक्टेयर (करीब 387 ग्राम) उपज ठहरा दिया। यह आंकड़ा स्लॉट बुकिंग पर्ची में चमक रहा है, जिसे देखकर किसान, ग्रामीण और हर समझदार इंसान दंग है।
क्या यह लापरवाही है, तकनीकी खराबी या जानबूझकर किसान को लूटने की साजिश? 3 एकड़ में सामान्यत: क्विंटलों गेहूं का उत्पादन होता है, लेकिन रिकॉर्ड में ग्रामों का फर्जीवाड़ा!

दीपक द्विवेदी चिल्ला रहे हैं—“मैंने पंजीकरण कराया, फसल तैयार है, लेकिन यह आंकड़ा मेरी खरीदी पर भारी संकट ला रहा। मेहनत की कमाई पर डाका कौन डाल रहा?” यदि यही रिकॉर्ड मान्य रहा, तो किसान की पसीने की कमाई धूल चाटेगी।
स्थानीय स्तर पर आग भड़क चुकी है। लोग चीख रहे हैं—प्रशासनिक घपला, भ्रष्टाचार का नंगा नाच! सवाल बम फूट रहे: आखिर वास्तविक उपज दर्ज करने में यह आपराधिक चूक कैसे हुई? कहीं अफसरों का गैंग किसानों को मंडी से भगाने की साजिश तो नहीं रच रहा?
अब प्रशासन की कसौटी पर समय है—त्रुटि सुधारो, वरना किसान सड़कों पर उतरेंगे! या फिर दीपक को दफ्तरों के चक्कर लगाकर अपनी ही फसल के लिए गिड़गिड़ाना पड़ेगा? यह मामला मध्यप्रदेश सरकार के MSP खरीदी तंत्र की पोल खोल रहा है—जल्द सुधारो, नहीं तो किसानों का गुस्सा बवंडर बनेगा!



