उपमुख्यमंत्री अरुण साव जो राज्य के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के मंत्री है और जिनको जल जीवन मिशन में ग्रामीणों तक पानी की आपूर्ति करने की जिम्मेदारी है वह रील बनाने में मस्त है और प्रदेश की जनता जल के लिए त्रस्त है!
यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि छत्तीसगढ़ में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है और मंत्री अरुण साव रील बना रहे है। केंद्र सरकार द्वारा हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद, राज्य के दूरस्थ आदिवासी इलाकों में आज भी लोग साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। जल जीवन मिशन को शुरू किए 6 साल हो चुके है पर हालात जस के तस है।
राज्य के सबसे संवेदनशील और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में गिने जाने वाले अबूझमाड़ और नारायणपुर में हालात बेहद चिंताजनक हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनको पहले पानी चाहिए क्योंकि यहां वे लोग आज भी गंदा और असुरक्षित पानी पीने को मजबूर हैं। यह वही क्षेत्र हैं, जिनके लिए सरकार ने सबसे ज्यादा फंड और विशेष मास्टरप्लान तैयार किया था।

2019 से लेकर अब तक केंद्र सरकार द्वारा 5000 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि जल जीवन मिशन के तहत छत्तीसगढ़ को दी जा चुकी है। बावजूद इसके, कई गांवों में पाइपलाइन, टंकी और जल स्रोतों का कोई अता-पता तक नहीं है।
2026 में 3000 से ज्यादा नक्सल प्रभावित गांवों तक पानी पहुंचाने के लिए 1300 करोड़ रुपये का विशेष प्लान तैयार किया गया लेकिन जमीनी रिपोर्ट बताती है कि यह योजना अभी तक कागजों से बाहर नहीं निकल पाई है। कई गांवों में आज तक एक बूंद साफ पानी भी नहीं पहुंचा।
2025-26 में भी ₹536.53 करोड़ जारी किए गए, लेकिन हालात जस के तस हैं। इससे पहले 2021-22 में ₹1900 करोड़ से ज्यादा का फंड दिया गया था।
आरोप है कि इसके लिए पूरा पूरा जिम्मेदार मंत्री अरुण साव है क्योंकि यह पूरा मिशन राज्य के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के अधीन आता है, जिसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर अरुण साव के पास है। आमजनों का कहना है कि उनको पता होगा कि जल जीवन मिशन में खर्च किए गए रुपए फाइलों से निकल कर कहां जा रहे है।
लगातार मिल रहे फंड, बड़े-बड़े प्लान और फिर भी जल जीवन मिशन की विफलता यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है। आदिवासी ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही स्थिति रही तो वे पानी के लिए दर बदर भटकते रहेंगे और गंदा पानी पीने के लिए मजबूर रहेंगे और इसका जिम्मेदार सीधा सीधा मंत्री अरुण साव होगा।


