छत्तीसगढ़ में खुले वैगनों से कोयले की ढुलाई को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। पिछले कई महीनों से ट्रेनों के जरिए बिना ढंके कोयला ले जाया जा रहा है। स्थानीय लोग हैरानी जताते हुए पूछ रहे हैं — क्या इस तरह खुले में कोयला ढोना नियमों के दायरे में आता है? क्या हाईकोर्ट की गाइडलाइन सिर्फ कागज़ों में ही सीमित रह गई है?
खुले वैगनों से उड़ता कोयला न केवल हवा को प्रदूषित करता है, बल्कि ट्रैक के किनारे बसे इलाकों में रहने वाले लोगों की सेहत पर भी असर डालता है। धूल के बारीक कण सांस के जरिए शरीर में पहुंचते हैं, जिससे दमा, एलर्जी और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि कोयले की ढुलाई के दौरान वैगनों को कवर करना या स्प्रे सिस्टम का उपयोग करना अनिवार्य होना चाहिए। सवाल यह भी है कि अगर अदालतों ने प्रदूषण नियंत्रण को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं, तो फिर जमीनी स्तर पर उनका पालन क्यों नहीं हो रहा?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि “अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में प्रदूषण की स्थिति और गंभीर हो सकती है।” लोग जिम्मेदार विभागों से जवाब चाहते हैं कि क्या कोयले से प्रदूषण नहीं होता? या फिर नियमों का पालन चुनिंदा मामलों में ही किया जाता है?
अब देखना होगा कि संबंधित विभाग और रेलवे प्रशासन इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या पर्यावरण सुरक्षा को लेकर ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।







