राजनीति में रिश्ते और विचार कब बदल जाएं, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है। एक समय था जब स्वर्गीय राजीव सातव के निधन के बाद उनका परिवार गहरे दुख और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था। उस मुश्किल वक्त में राहुल गांधी ने न सिर्फ भावनात्मक सहारा दिया, बल्कि उनके परिवार को राजनीतिक रूप से भी मजबूत करने की कोशिश की। इसी क्रम में परिवार के सदस्य को विधान परिषद तक पहुंचाया गया।
लेकिन अब राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है। कांग्रेस से दूरी बनाकर उसी परिवार ने नई राह चुन ली है।भारतीय जनता पार्टी ने डॉ. प्रज्ञा राजीव सातव को महाराष्ट्र से विधान परिषद उपचुनाव का उम्मीदवार बनाया है।
यह बदलाव सिर्फ एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि उस सच्चाई को भी उजागर करता है कि राजनीति में स्थायित्व से ज्यादा मौके और परिस्थितियां मायने रखती हैं।
जहां पहले यह परिवार कांग्रेस पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा था, वहीं अब नई दिशा में कदम बढ़ा चुका है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है क्या राजनीति में भावनाओं की कोई जगह बची है, या सब कुछ सिर्फ रणनीति और स्वार्थ के इर्द-गिर्द घूमता है?


